बुधवार, 24 अक्टूबर 2012

क्या ख़ुदा का कहीं वजूद है?

 रविवार, 21 अक्तूबर, 2012 को 17:55 IST तक के समाचार

बिग बैंग
हाल में हुए 'ईश्वरीय कण' की खोज इतनी अहम घटना है कि स्विट्ज़रलैंड स्थित सर्न प्रयोगशाला के संग्रहालय में चले रहे प्रदर्शनी में अधिक स्थानों पर वो अभी भी छाया हुआ है.
प्रदर्शनी में एक लघू-फ़िल्म भी मौजूद है जिसमें विश्व की उत्पत्ति के सिद्घांतों से संबंधित चित्रों को दिखाया गया है.
फ़िल्म शुरू होने पर एक आवाज़ आती है: 'क्या हम हिग्स बोसोन या ईश्वरीय कण को ढ़ूंढ़ पाएंगे?'
अब जबकि हिग्स की खोज पूरी हो चुकी है - एक ऐसी वैज्ञानिक खोज जो हमें बिग बैंग के फ़ौरन बाद के क्षणों के सबसे क़रीब लाती है; सर्न ने अपने दरवाज़े विद्वानों के लिए खोल दिए हैं जो विश्व की उत्पत्ति पर चिंतन-मनन कर रहे हैं.
पंद्रह अक्तूबर को धर्मशास्त्रियों, दार्शनिकों और भौतिकशास्त्रियों के एक समूह ने इसी मामले पर जेनेवा में एक बैठक की.

'ख़ुदा का सवाल'

लेकिन भौतिकशास्त्रियों के लिए बिग बैंग के पहले का वक़्त एक मुश्किल भरा सिंद्धांत है.
ये एक ऐसा क्षेत्र है जिसे लेकर अनुमान ही लगाया जा सकता है. तो क्या ये एक ऐसा क्षेत्र है जिसपर विज्ञान और धर्म में समझौता हो सकता है?
अरिज़ोना विश्वविद्यालय में 'उत्पत्ति प्रोजेक्ट' के प्रमुख और भौतिकशास्त्री लॉरेंस क्रास कहते हैं, "इस तरह की बैठकों से ये आभास होता है कि वैज्ञानिक ख़ुदा के सवाल पर ग़ौर करते हैं."
हिग्स बोसोन (फ़ाइल)
ये बहस हिग्स बोसोन की खोज के बाद शुरू हुई है.
"विज्ञान की ताक़त उसकी अनिश्चितता में है. सभी कुछ अनिश्चित है. लेकिन विज्ञान उस अनिश्चितता को परिभाषित कर सकता है."
"इसलिए विज्ञान में प्रगति होती है, लेकिन धर्म में नहीं."

विरोधाभास

लेकिन ये सोच की विज्ञान और मज़हब परस्पर-विरोधी हैं, बैठक में वाद-विवाद के विषय बने रहे.
जॉन लेनोक्स ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय में गणित के प्रोफ़ेसर हैं. लेकिन वो ख़ुद को एक ईसाई भी बताते हैं. वो मानते हैं कि मानव में गणित सीखने और सुलझाने की प्रवृति ख़ुदा की मौजूदगी को प्रमाणित करती है.
वो कहते हैं, "मेरे हिसाब से नास्तिकता तार्किकता का अवमूल्यन करता है जो विज्ञान के पहलूओं को समझने के लिए ज़रूरी है."
लेकिन सर्न का कहना है कि वो चाहता है कि दोनों पक्ष एक दूसरे के तर्कों को समझें.

दिशा

ऑक्सफोर्ड के ईयान रैमसे सेंटर फॉर साइंस एंड रिलीजन के निदेशक एंड्यू पिंसेंट का कहना है कि दार्शनिक सदियों से सत्य की खोज करते आए हैं.
हालांकि एक दूसरा पक्ष है कि जो लोग धर्म में यक़ीन रखते हैं वो सवाल करने से पहले ही मानते हैं कि उन्हें इसका जवाब मालूम है जबकि विज्ञान के मामले में ये बिल्कुल उलट है.
लेकिन वहीं एक और पक्ष ये भी है कि हालांकि धर्म विज्ञान के क्षेत्र में कोई नया सत्य नहीं जोड़ सकता है, लेकिन वो विश्व को लेकर हमारे ज्ञान को दिशा प्रदान कर सकता है.

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