बुधवार, 24 अक्टूबर 2012

क्या ख़ुदा का कहीं वजूद है?

 रविवार, 21 अक्तूबर, 2012 को 17:55 IST तक के समाचार

बिग बैंग
हाल में हुए 'ईश्वरीय कण' की खोज इतनी अहम घटना है कि स्विट्ज़रलैंड स्थित सर्न प्रयोगशाला के संग्रहालय में चले रहे प्रदर्शनी में अधिक स्थानों पर वो अभी भी छाया हुआ है.
प्रदर्शनी में एक लघू-फ़िल्म भी मौजूद है जिसमें विश्व की उत्पत्ति के सिद्घांतों से संबंधित चित्रों को दिखाया गया है.
फ़िल्म शुरू होने पर एक आवाज़ आती है: 'क्या हम हिग्स बोसोन या ईश्वरीय कण को ढ़ूंढ़ पाएंगे?'
अब जबकि हिग्स की खोज पूरी हो चुकी है - एक ऐसी वैज्ञानिक खोज जो हमें बिग बैंग के फ़ौरन बाद के क्षणों के सबसे क़रीब लाती है; सर्न ने अपने दरवाज़े विद्वानों के लिए खोल दिए हैं जो विश्व की उत्पत्ति पर चिंतन-मनन कर रहे हैं.
पंद्रह अक्तूबर को धर्मशास्त्रियों, दार्शनिकों और भौतिकशास्त्रियों के एक समूह ने इसी मामले पर जेनेवा में एक बैठक की.

'ख़ुदा का सवाल'

लेकिन भौतिकशास्त्रियों के लिए बिग बैंग के पहले का वक़्त एक मुश्किल भरा सिंद्धांत है.
ये एक ऐसा क्षेत्र है जिसे लेकर अनुमान ही लगाया जा सकता है. तो क्या ये एक ऐसा क्षेत्र है जिसपर विज्ञान और धर्म में समझौता हो सकता है?
अरिज़ोना विश्वविद्यालय में 'उत्पत्ति प्रोजेक्ट' के प्रमुख और भौतिकशास्त्री लॉरेंस क्रास कहते हैं, "इस तरह की बैठकों से ये आभास होता है कि वैज्ञानिक ख़ुदा के सवाल पर ग़ौर करते हैं."
हिग्स बोसोन (फ़ाइल)
ये बहस हिग्स बोसोन की खोज के बाद शुरू हुई है.
"विज्ञान की ताक़त उसकी अनिश्चितता में है. सभी कुछ अनिश्चित है. लेकिन विज्ञान उस अनिश्चितता को परिभाषित कर सकता है."
"इसलिए विज्ञान में प्रगति होती है, लेकिन धर्म में नहीं."

विरोधाभास

लेकिन ये सोच की विज्ञान और मज़हब परस्पर-विरोधी हैं, बैठक में वाद-विवाद के विषय बने रहे.
जॉन लेनोक्स ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय में गणित के प्रोफ़ेसर हैं. लेकिन वो ख़ुद को एक ईसाई भी बताते हैं. वो मानते हैं कि मानव में गणित सीखने और सुलझाने की प्रवृति ख़ुदा की मौजूदगी को प्रमाणित करती है.
वो कहते हैं, "मेरे हिसाब से नास्तिकता तार्किकता का अवमूल्यन करता है जो विज्ञान के पहलूओं को समझने के लिए ज़रूरी है."
लेकिन सर्न का कहना है कि वो चाहता है कि दोनों पक्ष एक दूसरे के तर्कों को समझें.

दिशा

ऑक्सफोर्ड के ईयान रैमसे सेंटर फॉर साइंस एंड रिलीजन के निदेशक एंड्यू पिंसेंट का कहना है कि दार्शनिक सदियों से सत्य की खोज करते आए हैं.
हालांकि एक दूसरा पक्ष है कि जो लोग धर्म में यक़ीन रखते हैं वो सवाल करने से पहले ही मानते हैं कि उन्हें इसका जवाब मालूम है जबकि विज्ञान के मामले में ये बिल्कुल उलट है.
लेकिन वहीं एक और पक्ष ये भी है कि हालांकि धर्म विज्ञान के क्षेत्र में कोई नया सत्य नहीं जोड़ सकता है, लेकिन वो विश्व को लेकर हमारे ज्ञान को दिशा प्रदान कर सकता है.

हिलती धरती के पीछे की वजह क्या है?

 मंगलवार, 23 अक्तूबर, 2012 को 11:24 IST तक के समाचार

स्पेन में भूकंप
स्पेन में आए भूकंप के अध्ययन ने एक नई बहस छेड़ दी है.
स्पने के शहर लॉर्का में 2011 में आए भूकंप का अध्ययन कर रहे वैज्ञानिकों का कहना है कि वहां भू-जल के अत्यधिक दोहन को भूकंप के लिए ज़िम्मेदार ठहराया जा सकता है.
सैटेलाइट के ज़रिए भूकंप प्रभावित इलाक़े की ली गई तस्वीरें से वो ये जानने में सफल हुए कि ज़मीन के किस हिस्से में हलचल हुई थी और कौन सा हिस्सा अपनी जगह से हट गया था.
वैज्ञानिकों के अध्ययन से पता चला है कि किस तरह बोरिंग के ज़रिए वर्षों तक ज़मीन से पानी निकालने से भूकंप आने का ख़तरा बढ़ सकता है.
यूनिवर्सिटि ऑफ़ वेस्टर्न ऑनटेरियो के प्रोफ़ेसर पैब्लो गॉनज़ालेज़ और उनके सहयोगियों ने सैटेलाइट रेडार के ज़रिए भेजे गए आंकड़ों के अध्ययन के बाद पाया कि स्पेन के शहर लॉर्का में आए भूकंप में ज़मीन के केवल तीन किलोमीटर नीचे ज़मीन का एक हिस्सा अपनी जगह से फिसला था .
वैज्ञानिकों के अनुसार इसी कारण भूकंप की तीव्रता केवल 5.1 होने के बावजूद बहुत ज़्यादा नुक़सान हुआ था.

जलस्तर में कमी

"हमने जो सबूत जमा किए हैं उनका इस्तेमाल भविष्य में बांध, जलीय चट्टान और ग्लेशियर के क़रीब होने वाली घटनाओं के अध्ययन में किया जा सकता है."
डॉक्टर पैब्लो गॉनज़ालेज़
वैज्ञानिकों ने जब और गहराई से इसका कारण पता लगाने की कोशिश की तो पाया कि भूकंप प्रभावित इलाक़े के निकट ऑल्टो ग्वाडेलेन्टिन बेसिन के भूमि-जल स्तर में पिछले 50 सालों में 250 मिटर की कमी आई है क्योंकि इलाक़े में सिंचाई के लिए वर्षों से पानी निकाला जा रहा था.
डॉक्टर गॉनज़ालेज़ ने समाचार एजेंसी रॉयटर्स से बातचीत के दौरान इस बात पर ज़ोर दिया कि उनका अध्ययन केवल स्पेन के भूकंप पर केंद्रित था और केवल एक जगह आए भूकंप से कोई आमधारण नहीं क़ायम की जा सकती है.
लेकिन उन्होंने अपने अध्ययन के महत्व को बताते हुए कहा, ''हमने जो सबूत जमा किए हैं उनका इस्तेमाल भविष्य में बांध, जलीय चट्टान और ग्लेशियर के क़रीब होने वाली घटनाओं के अध्ययन में किया जा सकता है.''
कैलिफ़ॉर्निया इंस्टीच्यूट आफ़ टेक्नॉलोजी के प्रोफ़ेसर जीन फिलिप का कहना है कि मूसलाधार बारिश से भी भूकंप आ सकता है.
पहले किए गए कोई शोध से पता चलता है कि हाइड्रॉलिक तरीक़े से गैस निकालने के कारण भी भूकंप आने की संभावना बनी रहती है.
प्रोफ़ेसर जीन फिलिप के अनुसार अगर विज्ञान भूकंप के सटीक कारणों को पता लगाने मे सफल हो जाता है तो फिर इस तरह की प्राकृतिक विपदाओं पर क़ाबू पाने में भी सफलता पाई जा सकती है.

सर्जन ने नहीं, रोबोट ने किया दिल का ऑपरेशन

 गुरुवार, 25 अक्तूबर, 2012 को 02:42 IST तक के समाचार

न्यू क्रॉस हॉस्पिटल के सर्जनों की टीम ने 'द विंची' रोबोट का इस्तेमाल दिल के ऑपरेशन में किया
ब्रिटेन में एक महिला के दिल का ऑपरेशन किसी सर्जन ने नहीं, बल्कि एक रोबोट ने किया. ब्रिटेन में ये इस तरह का पहला ऑपरेशन है.
लंदन के वॉल्वरहैंप्टन में न्यू क्रॉस हॉस्पिटल के सर्जनों की टीम ने इस ऑपरेशन के लिए 'द विंची' रोबोट का इस्तेमाल किया.
डॉक्टरों ने परिष्कृत कैमरे की मदद से नियंत्रण कक्ष में बैठ कर इस ऑपरेशन को संचालित किया.
22 साल की नेटली जोन्स के दिल में एक छेद था जिसे ठीक करने के लिए इस ऑपरेशन की जरूरत पड़ी.
डॉक्टरों का कहना है कि रोबोट के जरिए किया गया ऑपरेशन पारंपरिक सर्जरी की तुलना में रोगियों के लिए सुरक्षित है.

सुरक्षित और आरामदेह

सामान्य तरीके से दिल की सर्जरी के लिए रोगी के सीने में लंबा चीरा लगाना पड़ता है लेकिन, रोबोट के जरिए होने वाले इस ऑपरेशन में पसलियों के बीच छोटा चीरा लगाना पड़ता है.
इसी जगह से रोबोटिक आर्म यानी रोबोटिक भुजा शरीर के अंदर प्रवेश करती है.
इसके बाद नियंत्रण कक्ष में सर्जन उच्च गुणवत्ता वाले कैमरे के माध्यम से 3 डी में रोगी के भीतरी अंग देख कर ऑपरेशन का संचालन करते हैं.
हार्ट सर्जन स्टीफन बिलिंग कहते हैं, "इस प्रकिया में दर्द कम होता है और रोगी ऑपरेशन के बाद जल्द ही अपने रोजमर्रा के काम फिर से करने लगता है."
"मैं डरी हुई थी, लेकिन मैंनें रोबोटिक सर्जरी का फैसला इसलिए किया क्योंकि मैं एक बड़े चीरे का निशान नहीं चाहती थी, साथ ही रोबोट से ऑपरेशन कराने वाली पहली महिला बनने का विचार मुझे अच्छा लगा."
नेटली जोन्स
नेटली जोन्स के दिल में एक 3.5 सेंटीमीटर लंबा छेद था और इस ऑपरेशन को पूरा करने में डॉक्टरों को नौ घंटे लगे.
नेटली जोन्स कहती हैं कि वो चाहती थीं कि जल्द से जल्द ऑपरेशन हो जाए ताकि वो वह वापस अपने 21 महीने के बेटे की देखभाल के लिए घर जा सकें.
वो कहती हैं, "मैं डरी हुई थी, लेकिन मैंने रोबोटिक सर्जरी का फैसला इसलिए किया क्योंकि मैं एक बड़े चीरे का निशान नहीं चाहती थी, साथ ही रोबोट से ऑपरेशन कराने वाली पहली महिला बनने का विचार मुझे अच्छा लगा."

प्रशिक्षण

इससे भी अधिक जटिल प्रक्रिया वाला एक ऑपरेशन पेशे से बिल्डर 43 वर्षीय पॉल व्हाइटहाउस का किया गया. इसमें उनके वॉल्व की मरम्मत करनी थी.
डॉक्टरों का कहना है कि आमतौर पर ऑपरेशन के बाद ठीक होने और काम पर वापस लौटने में छह महीने लगते हैं लेकिन व्हाइटहाउस दो महीनों के बाद ही अपने काम पर वापस लौट सकते है.
स्वीडन और फिनलैंड के बाद ब्रिटेन तीसरा यूरोपीय देश है जहाँ खुले दिल की सर्जरी के लिए रोबोट का इस्तेमाल किया गया है.
सर्जनों की टीम ने इस तरह के ऑपरेशनों के लिए फिनलैंड में व्यापक प्रशिक्षण हासिल किया है.

गुरुवार, 18 अक्टूबर 2012

पृथ्वी व खगोलीय पिंड के टकराने से बना था चंद्रमा!
वाशिंगटन। शोधकर्ताओं ने नए अध्ययन में कहा कि चंद्रमा की उत्पत्ति एक खगोलीय पिंड के पृथ्वी से टकराने के बाद उत्पन्न विशाल आग की लपटों से हुई। अपोलो अभियानों के जरिए चंद्रमा से लाई गई मिट्टी और पत्थरों के अध्ययन से पता चला है कि इनमें भारी मात्रा में जस्ता मौजूद है जिससे अरबों साल पहले चंद्रमा की उत्पत्ति का संकेत मिलता है। चंद्रमा के बिना पृथ्वी पर जीवन संभव नहीं हो सकता था क्योंकि वर्तमान की तुलना में पहले यह पृथ्वी की परिक्र मा बहुत करीब से करता था जिससे तब यहां कुछ-कुछ घंटे के अंतराल में ज्वार भाटा पैदा होते थे। इन ज्वारों से तटरेखाओं पर लवणता में नाटकीय रूप से कमी या अधिकता होती थी जिसे अरबों साल पहले डीएनए जैसे जैविक अणु ‘बायोमॉलीक्यूल’ की उत्पत्ति का जिम्मेदार माना जाता है। शोधकर्ताओं के दल का नेतृत्व करने वाले वाशिंगटन विश्वविद्यालय के डॉक्टर फ्रेडरिक मोयनियर ने कहा कि शोधकर्ताओं ने चंद्रमा की चट्टानों के पत्थरों के 20 नमूनों और एक चंद्रक्षुद्रग्रह का अध्ययन किया। इनमें वह पत्थर शामिल हैं जो अपोलो 11, 12, 15 और 17 अभियानों में लाए गए थे। चंद्रमा से लाई गई मिट्टी और पत्थरों के अध्ययन से खुलासा : शोधकर्ता

क्यों मौत के बाद ज़िंदा हो जाते हैं लोग?

 शुक्रवार, 19 अक्तूबर, 2012 को 08:01 IST तक के समाचार

आपने कई बार फिल्मों में देखा होगा कि कोई व्यक्ति मर जाने के बाद फिर ज़िंदा हो गया. अफसाना सा लगने वाला ये किस्सा ब्रिटेन में इस हफ़्ते हक़ीकत में सामने आया.
तस्लीम रफ़ीक नाम की महिला घर पर बेहोश हो गई और उसे अस्पताल ले जाया गया जहाँ डॉक्टरों ने 45 मिनट तक उसकी जान बचाने की कोशिश की.
तस्लीम के परिवार को बताया गया कि उनका निधन हो गया है. लेकिन रिपोर्टों की मानें तो जब 11 घंटे बाद बेटी ने माँ ने कुछ पूछा तो तस्लीम उठ गईं.
इसी तरह अप्रैल में ख़बर आई थी कि मृत घोषित किए जाने के छह दिन बाद एक चीनी महिला अपने ही ताबूत से उठ खड़ी हुई थी.
1996 में भी ऐसा एक किस्सा हुआ थ. ब्रिटेन में एक किसान की पत्नी ने नए साल से पहले आत्महत्या की और उन्हें मृत बता दिया गया. लेकिन शवगृह में पाया गया कि उनकी साँसें चल रही हैं.
तो ऐसा कैसे हो जाता है कि डॉक्टर जिसे मरा हुआ घोषित कर दें वो फिर जि़दा हो जाते हैं ?
ज़िंदा या मृत

मौत की पुष्टि से पहले चेकलिस्ट

  • कोई हरकत नहीं
  • सांस लेने की कोशिश नहीं
  • दिल की धड़कन की आवाज़ या नब्ज़ नहीं
  • आँखों की पुतलियाँ फैली हुई हों
तस्लीमा के मामले में रेडिंग में रॉयल बर्कशायर अस्पताल का कहना है कि डॉक्टर नब्ज़ को नहीं पकड़ पाए क्योंकि वो बहुत ज़्यादा धीमे चल रही थी.
हालांकि चिकित्सिक मानते हैं कि ऐसा बेहद कम होता है कि इस तरह की स्थिति में गलत आकलन हो जाए.
वैसे ब्रिटेन में मौत की कोई क़ानूनी परिभाषा नहीं है लेकिन जब चीज़ें अस्पष्ट हों तो ऐसी स्तिथि में मौत की पुष्टि के लिए कुछ दिशा निर्देश हैं.
ब्रिटेन के डॉक्टर पीटर सिम्पसन कहते हैं, “अगर दिशा निर्देश ठीक से माने जाएँ तो ग़लत आकलन संभव ही नहीं है. मौत से वापस ज़िंदा होने के मामले मैने विदेशों से ही सुने हैं जहाँ दिशा निर्देश कड़े नहीं है. मौत हो चुकी है या नहीं ये तय करने के तीन अंश हैं. पहले पूछिए कि मौत क्यों हुई, फिर मौत का डायगनोसिस करो. मौत की पुष्टि करने से पहले पाँच मिनट तक इंतज़ार करो.”
मौत के डायगनोसिस में ये परखना ज़रूरी है- दिल की धड़कन और साँस पर नज़र रखना और ये देखना कि आँखों की पुतलियाँ बड़ी हो चुकी हैं और कुछ प्रतिक्रिया दे रही हैं या नहीं.
डॉक्टर पीटर कहते हैं, “अगर कुछ शक हो तो दोबारा जाँच करनी चाहिए. कई बार दिल काम करना बंद कर देता है और फिर चलने लगत है. इसे ऑटोरिससिटेशन कहते हैं. ये ज़्यादा से ज़्यादा 90 सैकेंड तक होता है.”
फिर चलने लगी साँस
ऑटोरिससिटेशन को लज़ारस सिंड्रोम भी कहते हैं. लज़ारस सिंड्रोम इसलिए कहा जाता है क्योंकि ईशु मसीह ने लज़ारस नाम के व्यक्ति की मौत के चार दिन बाद उसे ज़िंदा कर दिया था.
2001 में इमरजेंसी मेडिकल पत्रिका में इस तरह के 25 मामले बताए गए थे. ऑटोरिससिटेशन का मतलब है कि दोबारा होश में लाने की विफल कोशिशों के बाद प्रवाह अपने आप फिर से शुरु हो जाए.
ऑटोरिससिटेशन की वजह से ही ब्रिटेन में 2009 में माइकल विल्किल्सन नाम के व्यक्ति की अंतिम क्रिया के दौरान नब्ज़ वापस लौट आई थी और उन्हें आईसीयू में भर्ती किया गया था. वे दो दिन तक ज़िंदा रहे और अंतत उन्हें मृत घोषित किया गया.
जब शरीर का तापमान बेहद कम हो जाए
कुछ मामले ऐसे होते हैं जहाँ भ्रम की स्थिति होती है.-जैसे अगर दवाओं के कारण मरीज़ का तापमान बहुत कम हो जाता है या किसी मेडिकल डिसऑडर्र की वजह से मरीज़ के खून के रसायनों में बदलाव आ जाता है ( मधुमेह वगैहर में).
डॉक्टर पीटर कहते हैं, “ऐसी स्थितियों में अगर आप लक्ष्णों को नज़रअंदाज़ करते हैं तो मौत का डायगनोसिस गलत हो सकता है. जब तक मरीज सामान्य न हो जाए तब तक इंतज़ार करना चाहिए.”
बीबीसी की हॉरीज़न डॉक्यूमेंट्री से जुड़े डॉक्टर केविन फ़ॉन्ग एक वाक्या बताते हैं, “नार्वे की ऐना स्कीइंग के दौरान बर्फीली नदी में गिर गई थीं और 80 मिनट तक फँसी रहीं. इस कारण उनके शरीर के तापमान सामान्य से 20 डिग्री कम हो गया.
डॉक्टरों ने उन्हें बचाने के लिए नौ घंटे कोशिश की. एक मशीन उनके खून को शरीर के बाहर गर्म करती थी और फिर उसे नसों में प्रवाहित किया जाता था. जैसे जैसे शरीर का तापमान सामान्य हुआ, ऐना का दिल धड़कने लगा. वो मृत से ज़िंदा हो गई.
डॉक्टर की नैतिक ज़िम्मेदारी
मौत की पुष्टि के दिशा निर्देशों में ये नैतिक बात भी शामिल है कि ये बात बिना बेवजह की देरी से बता देनी चाहिए.
डॉक्टर डेनियल कहते हैं, “किसी की मौत की पुष्टि करना दूसरों पर गहरा असर डालता है. डॉक्टरों की ये नैतिक ज़िम्मेदारी है कि वो मौत का डायगनोसिस सही तरीके से करें. ज्ञान और अनुभव की कमी, समय की कमी, थकावट, सहकर्मचारियों का दबाव ...ये सब बातें किसी डॉक्टर के आकलन को प्रभावित कर सकती हैं.
डॉक्टर डेनियल के मुताबिक जटिल मामलों में अनुभवी डॉक्टरों को ही मौत की पुष्टि करनी चाहिए. किसी दूसरे डॉक्टर की राय लेने से गलती की गुंजाइश कम हो जाती है.

मंगलवार, 16 अक्टूबर 2012

बदहाली के आंसू रोता नेहरु का 'स्विट्ज़रलैंड'

 मंगलवार, 16 अक्तूबर, 2012 को 08:34 IST तक के समाचार

भारत की बड़ी से बड़ी बिजली कंपनियों के आसमान छूते बिजली कारखाने और इन कारखानों के सामने बौने से लगते बदहाल गांव और अंधेरी बस्तियां. क्लिक करें ये नज़ारा है उत्तर-प्रदेश-मध्यप्रदेश के बीच बंटे सोनभद्र-सिंगरौली का जो आज भारत में 'बिजली का गढ़' है लेकिन फिर भी देश के सबसे पिछडे इलाकों में से एक है.
क्लिक करें सोनभद्र-सिंगरौली का ये इलाका 1962 में भारत के नक्शे पर उस वक्त चमका जब रिंहद बांध (गोविंद बल्लभ पंत सागर बांध) का उदघाटन करने प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु यहां आए और इस इलाके को भारत का स्विट्ज़रलैंड कहा.
ब्रजमोहन का परिवार
ब्रजमोहन की 43 साल की बेटी मानसिक रोग का शिकार हैं. प्रदूषण के चलते इस इलाके में विकलांगता और मानसिक बीमारियों के मामले भी अधिक हैं.
बांध विस्थापितों के गांव कुसमाहा में रहने वाले ब्रजमोहन उस दिन को याद करते हुए कहते हैं, ''विस्थापितों को अपनी ज़मीन से उजड़ने का दुख तो था लेकिन नेहरु जी ने कहा देश को विकास की ऊंचाईयों तक ले जाना है. हमसे कहा था कि गांव में बिजली आएगी और सबको नौकरी मिलेगी.''

अधूरे रह गए सपने

72 साल के ब्रजमोहन आज भी उस बिजली का इंतज़ार कर रहे हैं. दिन ढले अंधेरे में लालटेन टटोलकर रोशनी करते हुए कहते हैं, “हमारी उपजाऊ ज़मीन लेकर सरकार ने हमें यहां पठार में बसा दिया. हम आज भी हैंडपंप से पानी खींचकर खेत में सिंचाई करते हैं. यहां केवल सब्जी उगती है और पैदावार इतनी ही है कि तीन लोगों का पेट भर पाए. कंपनी वालों ने घर के बराबर में बिजली का खंभा गाड़ा था. तार भी पड़े लेकिन बिजली आजतक नहीं आई.’’
घर से बाहर निकलते ही खंभे पर नज़र पड़ी तो दिखा कि बेकार खड़ा बिजली का खंभा झोंपड़ी पर आधे से ज़्यादा झुक गया है. किसी भी दिन तेज़ बारिश या अंधड़ में गिरा तो उनकी रही-सही पूंजी भी ले डूबेगा.
कोयले और पानी के खज़ाने से आबाद लेकिन बदहाल इस इलाके में लगभग सभी गांवों और बस्तियों की यही कहानी है. 1962 में जिस जगह रिंहद बांध बना वो उस वक्त सोनभद्र-सिंगरौली का सबसे बड़ी आबादी वाला इलाका था.
"“त्याग का पाठ हमेशा उन्हीं लोगों को क्यों पढ़ाया जाता है जो लोग अपना शरीर गलाकर अपने बच्चों को अपाहिज बनाकर पहले ही इस बिजली की कीमत चुका रहे हैं. विकास के नाम पर हज़ारों करोड़ का मुनाफ़ा कमा रही इन कंपनियों क्या यहां लोगों का इलाज नहीं करा सकतीं. अब हमारे पास त्याग के लिए सिर्फ प्राण बचे हैं वो भी सरकार ले ही रही है.’’"
अजय शेखर, लेखक एंव स्थानीय निवासी
जल्द ही सरकार को इस इलाके में फैले काले सोने की खबर लगी और देखते ही देखते 2,200 किलोमीटर में कोयला खदानें भी खुद गईं. 1951 के जनसंख्या आंकड़ों के मुताबिक उस वक्त विस्थापितों की संख्या 1,05,000 थी.

बांध और खदानों से हुए बेघर

आज इलाके के ज्यादातर गांव उन बांध और खदान विस्थापितों के हैं जो अपनी ज़मीन से बेघर हुए और कारखानों के जानलेवा प्रदूषण से बेहाल हैं.
6500 मेगावाट से शुरु हुआ बिजली उत्पाद आज 10,000 मेगावाट है और 2018 तक 35,000 का लक्ष्य रखता है, लेकिन चिल्काटांड में रहने वाले वेदान्ती प्रजापति के लिए ये देश का विकास नहीं बल्कि ज़िंदगी और मौत का सवाल है.
एनसीएल की कोयला खदान वेदांती प्रजापति के घर के पीछे तक पहुंच चुकी है. खदान के नीचे बैठे वेदांती प्रजापति और उनका परिवार.
प्रजापति के घर और एनसीएल की खदान के बीच 500 मीटर से भी कम की दूरी है. घर की छत से नज़र दौड़ांए तो चारों ओर दिखते हैं आसमान छूते मिट्टी के विशाल पहाड़ जो एनसीएल की कोयला खदान से निकली है. बिना कोई सवाल उनका पहला जवाब ही सारी कहानी कह देता है, “हमको कुछ नहीं कहना है साहब, कारखानों से भागते-भागते हम थक गए. बांध बना तो घर डूब गया. बाप-दादा हमें लेकर दूसरी बस्ती में बसे. फिर एनटीपीसी ने प्लांट लगाया और हमें यहां भेज दिया. यहां भी अब गुजारा मुश्किल है. बारिश में पहाड़ों की मिट्टी घरों में घुस आती है. खदान में ब्लास्टिंग होती है तो भूकंप के जैसे पूरा घर हिलता है.”
भगोड़ों सी ज़िंदगी और रोज़ी-रोटी की तलाश में भटकने का डर वेदान्ती के चेहरे पर साफ़ दिखाई देता है, लेकिन घर के दरवाज़े तक पहुंच चुकी खदान और धमाकों से चटकती दीवारों ने ज़िंदगी को इतना बेहाल कर दिया है कि किसी भी कीमत पर लोग बस्ती छोड़ देना चाहते हैं.

'भगोड़ों सी ज़िंदगी'

विस्थापितों की सबसे बड़ी समस्या है कि कंपनियों की संख्या और खदानों का क्षेत्र लगातार बढ़ता जा रहा है. एक कंपनी उन्हें विस्थापित कर जिस जगह बसाती है वहां दूसरी कंपनी का कारखाना उनके लिए बोरिया-बिस्तर बांधे तैयार रहता है.
प्रजापति की बातचीत में जो गुस्सा झलकता है वो चिल्काटांड के लगभग हर बाशिंदे की कहानी है. अपनी आठ साल की विकलांग बेटी को स्कूल से घर लाती एक महिला को रोकर जब हमने बात करनी चाही तो दो टूक जवाब मिला, “हर कोई तो सर्वे करने चला आता है, लेकिन बदलता कुछ नहीं. पता नहीं कागजों में क्या लिखते हैं कि लखनऊ-दिल्ली जाकर सब बात पलट जाती है. हमारा नाम मत लिखिएगा. कंपनी वाले कहते हैं कि विस्थापित गुंडागर्दी करते हैं गलत बात फैलाते हैं.''
चिल्काटांड
इलाके की ज़्यादातर बस्तियां खदान से निकली मिट्टी के पहाड़ों से घिर चुकी हैं.
नई बस्ती की मांग कर रहे चिल्काटांड निवासी मनोनीत कहते हैं, “जहां आप खड़ी हैं अगले साल यहां ब्लास्टिंग हो रही होगी. इसी तरह खदान बढ़ती है. सच ये है कि जिस ज़मीन पर विस्थापितों को बसाया जाता है उसका मालिकाना हक़ कंपनी के पास रहता है. वो जब चाहे हमें हटा सकते हैं, जबकि विस्थापित न ज़मीन बेच सकते हैं न उसपर कर्ज़ ले सकते हैं. कुलमिलाकर खेत मालिक से आज हम बेघर विस्थापित हो गए.”

उद्दोगों के गढ़ में 'बेरोज़गार'

"शुरुआत में सभी बिजली-उद्दोग केंद्र या राज्य सरकार के थे. सरकारों ने बाकायदा विस्थापितों के साथ लिखित करार किए. बाद में ये उद्दोग निजी कंपनियों को सौंप दिए गए. लैंको जैसी कंपनियां अब कहती हैं कि पुराने करार की कोई मान्यता नहीं. क्या सरकार उन वादों को भी पूरा नहीं करेगी जो उसने लिखित में किए हैं."
शुभाप्रेम, वनवासी सेवा आश्रम
विस्थापन से पैदा हुई सबसे बड़ी समस्या है बेरोज़गारी की. 2011 में आई ग्रीनपीस की एक रिपोर्ट के मुताबिक केवल उत्तप्रदेश राज्य विद्युत उत्पादन निगम की अनपरा परियोजना को ही देखें तो जिन 2205 लोगों को तुरंत प्रभाव से नौकरी देने का वादा किया गया था उनमें से केवल 234 को नौकरी दी गई. ये समस्या हर गांव, हर परियोजना की है. शक्तिनगर निवासी राजबीर कहते हैं, “जितने भी कारखाने यहां खुले उनमें स्थानीय लोगों को बहुत कम नौकरियां दी गई हैं. ऊपर से लेकर नीचे मज़दूर तक बिहार, छत्तीसगढ़ दिल्ली से लाए गए हैं. विस्थापित अपने हक की बात करते हैं इसलिए उन्हें अराजक कहा जाता है और नौकरी पर नहीं रखा जाता.”
बिजली उद्दोग जैसे-जैसे बढ़ रहा है उससे जुड़ी कंपनियों की सीमेंट, रसायन और पत्थर की फैक्ट्रियां भी इलाके पर कब्ज़ा जमा रही हैं. इस साल फरवरी में पत्थर की एक अवैध खदान में हुए भयानक हादसे के बाद दिन-रात चलने वाले क्रशर तो तालाबंद हैं लेकिन जंगलों में अवैध कटाई के बाद रिहंद जलाशय में बहाकर कैसे कीमती लकड़ी की तस्करी की जा रही है ये नज़ारा हमने खुद देखा. कुलमिलाकर सोनभद्र में संसाधनों की ऐसी लूट मची है जिसमें हर कोई अपने हाथ धो लेना चाहता है.

सरकारी चुप्पी

बेलवादाह में जल स्रोत में मिलती कारखाने की राख. कारखानों की राख इलाके की मिट्टी को बंजर करती जा रही है.
बीबीसी ने सोनभद्र के प्रभारी डीएम रामकृष्ण उत्तम से इस बाबत बात करनी चाही तो उन्होंने कुछ भी कहने से मना करते हुए सीधे फोन काट दिया. लेकिन भारत की एक अरब आबादी की बिजली की ज़रूरत और विकास के सवाल पर सोनभद्र से मांगी जा रही कीमत क्या वाकई ज्यादा है.
सोनभद्र में पूरी उम्र बिताने वाले अजय शेखर इस सवाल पर टीस से भर उठते हैं, “त्याग का पाठ हमेशा उन्हीं लोगों को क्यों पढ़ाया जाता है जो लोग अपना शरीर गलाकर अपने बच्चों को अपाहिज बनाकर पहले ही इस बिजली की कीमत चुका रहे हैं. विकास के नाम पर हज़ारों करोड़ का मुनाफ़ा कमा रही इन कंपनियों को क्या इसके लिए भी बाध्य नहीं किया जा सकता कि वो कम से इन लोगों का इलाज करांए. उन्हें अपने यहां नौकरी पर रखें. अब हमारे पास त्याग के लिए सिर्फ प्राण बचे हैं वो भी सरकार ले ही रही है.’’

आबाद या बर्बाद

इस इलाके में 1954 से काम कर रही संस्था वनवासी सेवा आश्रम से जुड़ी शुभा प्रेम कहती हैं, “शुरुआत में सभी बिजली-उद्दोग केंद्र या राज्य सरकार के थे. सरकारों ने बाकायदा विस्थापितों के साथ लिखित करार किए. बाद में ये उद्दोग निजी कंपनियों को सौंप दिए गए. लैंको जैसी कंपनियां अब कहती हैं कि पुराने करार की कोई मान्यता नहीं. क्या सरकार उन वादों को भी पूरा नहीं करेगी जो उसने लिखित में किए हैं.”
सोनभद्र जो कभी अपनी चिरौंजी और कत्थे की फसल, बीड़ी बनाने वाले पलाश के पत्तों और बहेड़े के हरे-भरे जंगलों के लिए जाना जाता था, आज ऊर्जा की राजधानी है और दिन-रात धुंआ उगलते कारखानों से आबाद है.
लेकिन यहां के लोगों की टीस बस यही है कि बहेड़े से बिजली तक, विकास का ये सफर सोनभद्र-सिंगरौली को बर्बाद कर गया है.

कागज बताएगा आपका ब्लड ग्रुप

 शुक्रवार, 4 मई, 2012 को 05:09 IST तक के समाचार
किसी व्यक्ति का ब्लड ग्रुप पता करने में गल्तियों के गंभीर परिणाम हो सकते हैं.
अगर आपने लेखिका जेके रॉलिंग की हैरी पॉटर श्रृंखला पढ़ी है, तो आपको उस डायरी की याद जरूर आएगी, जो 'खुद ही लिखती' है. इसी डायरी से प्रेरित होकर शोधकर्ताओं ने ऐसा कागज बनाया है, जो व्यक्ति का ब्लड ग्रुप बताता है.
ऑस्ट्रेलिया के मोनाश विश्वविद्यालय में शोधकर्ताओं की टीम ने कागज पर आधारित सेंसर विकसित किया है जो व्यक्ति का ब्लड ग्रुप शब्दों में लिखता है.
इस सेंसर से गैर-विशेषज्ञों को नतीजों का विश्लेषण करने में मदद मिल सकती है, खासकर आपात स्थिति और मानवीय आपदाओं में.
अध्ययन अंगवांडटे केमि नाम के जरनल में छपा है.
ये सेंसर रक्त के एबीओ वर्गीकरण पर आधारित है, जिसके तहत रक्त को ए, बी, एबी, और ओ वर्गों में बांटा जाता है. साथ ही रक्त को आरएच पॉजीटिव और आरएच नेगेटिव में भी वर्गीकृत किया जाता है.
एबीओ वर्गीकरण में ए या बी वर्ग से पता चलता है कि लाल रक्त कोशिकाओं में कौन से एंटीजन मौजूद हैं.
उदाहरण के लिए अगर किसी का ब्लड ग्रुप ए है तो उसमें ए एंटीजन मौजूद होंगे, एबी ब्लड ग्रुप वाले व्यक्ति की लाल रक्त कोशिकाओं में ए और बी दोनों ही एंटीजन और ओ ग्रुप वाले व्यक्ति में कोई भी एंटीजन नहीं होगा.

ज्यादा सस्ता और तेज

इस शोध का नेतृत्व कर रहे मोनाश विश्वविद्यालय के प्रोफेसर वेई शेन ने बीबीसी को बताया कि अक्सर घर पर रक्त परीक्षण करने वाले लोग या फिर विकासशील क्षेत्रों में विशेषज्ञ रक्त के वर्गीकरण में गलती कर देते हैं और इन गलतियों के गंभीर परिणाम हो सकते हैं.
इस कागज पर ब्लड ग्रुप अक्षर खदु-ब-खुद दिखाई देने लगते हैं.
प्रोफेसर शेन ने बताया, "हमने पाया कि 80 प्रतिशत से ज्यादा आबादी नतीजे ठीक से समझ नहीं पाती. लेकिन ये यंत्र, जो लोगों का लिखित में रक्त ग्रुप दिखाएगा, इससे लोग ज्यादा आसानी से अपना ब्लड ग्रुप का पता लगा पाएंगे."
इस सेंसर की दुनिया भर के अस्पतालों और पैथोलॉजिकल प्रयोगशालाओं में इस्तेमाल हो रही रक्त वर्गीकरण तकनीकों के साथ तुलना करने पर शोध टीम ने पाया कि ये सेंसर न सिर्फ उन तकनीकों जितने ही सही हैं बल्कि उनसे ज्यादा सस्ते और इस्तेमाल में ज्यादा आसान और तेज.
प्रोफेसर वेई शेन का कहना है कि इन कारणों से ये सेंसर विकासशील क्षेत्रों के लिए सबसे सही है.
शोध से जुड़े एक और वैज्ञानिक, डॉ. जॉन ब्रेनन कहते हैं, "मुझे लगता है कि इस तरह की ब्लड ग्रुप बताने वाली कागज की पट्टियां ऐसी स्थितियों में इस्तेमाल हो सकती हैं जहां तुरंत जल्द-से-जल्द खून चढ़ाने की जररूत होती है, जैसे लड़ाई के मैदान या सड़क दुर्घटनाओं में. ऐसे मौकों पर बिल्कुल सही ब्लड ग्रुप बताने वाले ऐसे कागजी सेंसर बहुत महत्वपूर्ण होंगे."

सेंसर की संरचना

इस यंत्र में कागज के छोटे टुकड़े से बना एक सेंसर लगा होता है. सेंसर पर हाइड्रोफोबिक यानी पानी को दूर करने वाली कोटिंग है लेकिन ये कोटिंग चार 'खिड़कियों' पर नहीं लगाई गई, जिससे वो पानी सोख सकती हैं.
सेंसर के हर हिस्से का आकार अलग है. उदाहरण के लिए, एक हिस्सा 'ए' की तरह है और दूसरा 'बी' के आकार में. इन हिस्सों को एंटीबॉडी से भरा जाता है जो लाल रक्त कोशिकाओं के साथ परस्पर क्रिया करते हुए, ब्लड ग्रुप के हिसाब से, गुच्छा बना लेती हैं.
जब ए ब्लड ग्रुप की एंटीबॉडी वाले कागज के हिस्से पर ए ग्रुप के रक्त की बूंद पड़ती है, तब लाल रक्त कोशिकाएं गुच्छा बना लेती हैं और कागज के रेशों में चिपक जाती हैं जिससे 'ए' अक्षर दिखाई देता है.

एक ऐसा बैक्टीरिया जो बनाएगा कंप्यूटर

 मंगलवार, 8 मई, 2012 को 05:28 IST तक के समाचार

चुम्बकीय बैक्टीरिया
यह बैक्टीरिया लोहे को पचा कर अपनी भीतर चुम्बक बना लेता है.
वैज्ञानिकों ने एक ऐसे चुम्बकीय बैक्टीरिया या जीवाणु की खोज की है जो आगे चल कर कम्प्यूटरों और इलेक्ट्रॉनिक्स का आधार बन सकता है.
ब्रिटेन के लीड्स विश्वविद्यालय और जापान के टोक्यों कृषि और तकनीक विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक मिल कर एक ऐसे बैक्टीरिया पर शोध कर रहे हैं जो लोहा खाता है.
यह बैक्टीरिया लोहे को पचा कर अपने भीतर चुम्बक बना लेता है. यह चुम्बक कुछ उसी तरह के होते हैं जिस तरह के कंप्यूटर की हार्ड ड्राइव के अंदर होते हैं.
वैज्ञानिकों का दावा है कि इस शोध की वजह से ऐसा हो सकता है कि आने वाले दिनों में बहुत तेज़ गति से चलने वाली हार्ड ड्राईव बनाई जा सकें.
इस शोध के बारे में विज्ञान पत्रिका स्मॉल में विस्तार से छापा गया है.
" हम तेज़ी से परंपरागत इलेक्ट्रॉनिक्स की उन सीमाओं तक पहुँच रहे हैं कंप्यूटर के पुर्जे छोटे और छोटे होते जा रहे हैं. जिन मशीनों का इस्तेमाल हम इन पुर्जों को बनाने के लिए करते हैं वो बहुत निपुण नहीं हैं"
डॉ साराह स्टानीलैंड, लीड्स विश्विद्यालय
जैसे-जैसे तकनीक प्रगति करती जा रही है और कंप्यूटर छोटे होते जा रहे हैं, अत्यधिक छोटे या बारीक स्तर के इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को बनाना कठिन होता जा रहा है.

अब इस समस्या के हल के लिए वैज्ञानिक प्रकृति का सहारा ले रहे हैं.

चुम्बकीय बैक्टीरिया

इस शोध के लिए वैज्ञानिकों ने जिस बैक्टीरिया का इस्तेमाल किया है वो तालाबों में पानी की सतह के भातर उन जगहों पर पाया जता है जहाँ ऑक्सीजन कम होती है.
यह बैक्टीरिया पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्रों में कम्पास की दिशा में इस तरह से तैरा करते हैं कि यह ऑक्सीजन के केंद्र खोज सकें.
जब यह बैक्टीरिया लोहा खाते हैं तो इनके सूक्ष्म शरीरों के अंदर का प्रोटीन उस तरह का चुम्बकीय पदार्थ पैदा करता है जो पृथ्वी पर अपनी तरह का सर्वाधिक शक्तिशाली पदार्थ होता है.
वैज्ञानिक इस बात का अध्यन कर रहे हैं कि यह बैक्टीरिया किस तरह से लोहे को पचाता है और किस तरह से उसके बाद चुम्बक को अपने शरीर के भीतर सहेज कर रखता है.
वैज्ञानिक इन्ही तरीकों का इस्तेमाल कर के बाहर चुम्बक "उगाना" चाहते हैं.
लीड्स विश्विद्यालय की डॉ साराह स्टानीलैंड कहती हैं " हम तेज़ी से परंपरागत इलेक्ट्रॉनिक्स की उन सीमाओं तक पहुँच रहे हैं कंप्यूटर के पुर्जे छोटे और छोटे होते जा रहे हैं.और जिन मशीनों का इस्तेमाल हम इन पुर्जों को बनाने के लिए करते हैं वो बहुत निपुण नहीं हैं" डॉ साराह.
"कंप्यूटर के अलावा इन नलियों या तारों का इस्तेमाल मनुष्य की देह पर सर्जरी करने के लिए भी किया जा सकता है "
डॉ मासायोशी तानाका, टोक्यो विश्वविद्यालय
डॉ साराह के अनुसार इस समस्या का जवाब प्रकृति के ही पास है.

जैविक तार

इन बैक्टीरिया के ज़रिये चुम्बक बनाने के अलावा वैज्ञानिक इन जीते-जागते बैक्टीरिया की मदद से से तार भी बना रहे हैं.
इन बैक्टीरिया के शरीर के उपर मौजूद झिल्ली की मदद से वैज्ञानिकों ने अति सूक्ष्म नलियां भी बनाई हैं.
भविष्य में इस तरह की नलियां अति सूक्ष्म जैविक तारों को बनाने में मदद देंगीं. वैज्ञानिक चाहते हैं कि इन नलियों की मदद से कम्प्यूटरों के भीतर सूचनाओं को ठीक उसी तरह से एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाया जा सके जिस तरह से मनुष्य की देह के भीतर मौजूद् कोशिकाएं करतीं हैं.
टोक्यो विश्वविद्यालय के डॉ मासायोशी तानाका ने बीबीसी को बताया " कंप्यूटर के अलावा इन नलियों या तारों का इस्तेमाल मनुष्य के शरीर पर सर्जरी करने के लिए भी किया जा सकता है".
अभी मौजूद तार मनुष्य के शरीर के अंदर सर्जरी करने के लिए बहुत बारीक तो हैं लेकिन वो शरीर में घुलते मिलते नहीं यही सबसे बड़ी समस्या है. डॉ तानाका के अनुसार जैविक तारों के बनने से यह समस्या समाप्त हो जाएगी.

हैदराबाद में जैव विविधता को सहेजने की चुनौती पर सम्मेलन


भारत की कुल आबादी एक अरब बीस करोड़ है जो कि विश्व जनसंख्या का लगभग 18 फ़ीसदी है. इस देश में इंसान और वन्य-जन जीवन के लिए विश्व भूमि का 2.4 हिस्सा ही उपलब्ध है.
ऐसे में दोनों के बीच संघर्ष होना लाज़िमी है. इस स्थिति में दोनों के बीच तनाव स्वाभाविक है. ज़ाहिर है कि आख़िर में नुक़सान हमेशा जैव विविधता को ही उठाना पड़ता है. यह भी सही है कि इंसान भी इसके बिना जीवित नहीं रह सकता.

40 अरब डॉलर की ज़रुरत

हैदराबाद में 190 देशों के 12 हज़ार से भी अधिक विशेषज्ञ इस बात पर विचार विमर्श कर रहे हैं कि विश्व के जीन पूल को कैसे बचाया जाए. इन सभी का मानना है कि विश्व की इस अनमोल धरोहर को बचाने के लिए 40 अरब डॉलर की राशि की ज़रूरत है.
जैव विविधता पर सम्मेलन
जैव विविधता पर है पूरी दुनिया में चिंता
पिछले दशक में भारत ने कम से कम पांच दुर्लभ जानवर लुप्त होते देखे हैं. इनमें इंडियन चीता, छोटे क़द का गैंडा, गुलाबी सिर वाली बत्तख़, जंगली उल्लू और हिमालयन बटेर शामिल है. ये सब इंसान के लालच और जगलों के कटाव के कारण हुआ है.
इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंज़र्वेशन ऑफ़ नेचर (आईयूसीएन) ने चेताया है कि इस समय 929 दुर्लभ प्रजातियां ख़तरे में हैं. 2004 में यह संख्या 648 थी. विश्व धरोहर को गंवाने वाले देशों की शर्मनाक सूची में भारत चीन से ठीक बाद सातवें स्थान पर है.
संयुक्त राष्ट्र कंवेनशन ऑन बायोलॉजिकल डायवर्सेटी ( सीबीडी) संधि पर 193 देशों ने हस्ताक्षर करने के अलावा इस पर अमल किया है. लेकिन हैरानी की बात है कि अमरीका इसे मानने से इनकार कर चुका है. इस मसले पर सूडान भी अमरीका के साथ खड़ा है.

अमरीका का इनकार

अमरीका ने सीबीडी को 1994 से मानने से इनकार कर रखा है. अमरीका को इस संधि की उस सबसे अहम शर्त सहित कई बातों पर एतराज़ है जिसमें कहा गया है कि सभी देशों को विश्व वैविधता के बराबर के फ़ायदे मिलने चाहिएं. चूंकि भारत इस सम्मेलन का मेज़बानी कर रहा है, इसलिए उसे अमरीका को भी इस संधि के दायरे में लाने की कोशिश करनी चाहिए.
पर्यावरण मंत्री जंयती नटराजन ने कहा है कि वह इस बारे में अमरीका से बात करेंगी.
भारत में बाघों की संख्या पर अरसे से चिंता जताई जाती रही है.
सरकार की नेशनल वायोडायवर्सिटी अथारिटी (एनबीए) भारत के 70 फ़ीसदी हिस्से में पाए जाने वाले एक लाख 50 हज़ार दुर्लभ पौधों और जानवरों के ही आंकड़े एकत्र किए जा सके हैं. मंत्रालय ने स्वीकार किया है कि अभी बहुत बड़ा अंतर हैं.
कौन जानता है कि अभी और कितनी दुर्लभ प्रजातियां और मिल सकती हैं और जिस तेज़ी से हम इन्हें खो रहे है, यह ठीक जीवन की लाइब्रेरी से किताबों को बिना पढ़े जला देने जैसा है.
कई लोगों को इस बात की हैरानी होगी कि अभी 2005 में अरुणाचल प्रदेश में दुर्लभ प्रजाति का बंदर मिला था. जियोलॉजिक्ल सर्वे आफ़ इंडिया के अनुसार 2011 में जानवरों की 193 नई प्रजातियां पाई गईं.
भारत शेर, बाघ, हाथी और गैंडे को बचाने के लिए संघर्ष कर रहा है. हालांकि इस बीच अफ़्रीक़ा से इंडियन चीते को लाने के प्रयास भी हुए हैं. लेकिन यह भी सच है कि देश शेरों के लिए उपयुक्त वैकल्पिक रिहाइश खोज पाने में सफल नहीं हो पा रहा है.

बाघ की संख्या बढ़ी

ये भी नहीं है कि भारत अपनी जैव विविधता को बचाने के लिए कोई कोशिश नहीं कर रहा. देश का 4.8 प्रतिशत भौगोलिक हिस्से को सुरक्षित क्षेत्र में रखा गया है. 2011 में देश भर में 1706 वयस्क बाघ गिने गए थे जबकि 2006 में यह संख्या सिर्फ़ 1411 थी.
मंत्रालय के अनुसार भारत इस समय जैव विविधता पर दो अरब डॉलर ख़र्च कर रहा है. इसके परिणाम भी सामने आने लगे हैं. आईयूसीएन ने शेर जैसी पूंछ वाले बंदर को 25 लुप्तप्राय जानवरों की सूची से हटा दिया है क्योंकि इसकी संख्या में इज़ाफ़ा हुआ है.
नटराजन ने इस बारे में कहा, " भारत इस मुद्दे पर काफ़ी मज़बूती के साथ बात करने की स्थिति में है क्योंकि अपने आर्थिक विकास, ग़रीबी उन्मूलन और जैव विविधता के संरक्षण के बीच संतुलन रखना उसकी ज़रुरत है. "
हालांकि ज़मीन की तुलना तटीय क्षेत्रों में ज़्यादा काम नहीं हो पाया है क्योंकि यहां सिर्फ़ एक प्रतिशत प्रजातियों का ही संरक्षण किया जा सका है. वैसे सीबीडी को किए गए भारत के वादे के मुताबिक़ यह लक्ष्य 10 फ़ीसदी होना था.
भारत के जलक्षेत्र में 13 हज़ार लुप्तप्राय प्रजातियों की गणना की गई है. आठ हज़ार किलोमीटर तटरेखा के आसपास बंदरगाह और बिजली घर जैसी विकास परियोजनाओं के कारण कई मछलियों और प्रवाल भिति ख़तरे में हैं.
भारत गेंहू और चावल जैसे खाद्यान्न के पौधों के मामले में एक बड़ा केंद्र है. दुनिया भर में तीन अरब लोग भारतीय चावल का स्वाद चखते हैं. भारत में चावल की क़रीब 50 हज़ार भिन्न क़िस्में हैं. इनमें से कई का दिल्ली स्थित नेशनल जीन बैंक के फ्रिजों में संरक्षित है.
भारतीय जंगली भूमि में सदियों से जंगली आम, चाय, ज्वार, बाजरा, दालों के पौधों से पटी पड़ी है. इसके अलावा जानवरों में भैंसा, गधा और बकरियां शामिल हैं. एनबीए के 2010 के अनुमान अनुसार भारत में 8850 करोड़ के जैव विविध निर्यात की संभावना है. इसमें घरेलू खपत शामिल नहीं है.
पर्यावरण मंत्रालय के अनुसार देश के 23.4 प्रतिशत भाग में जंगल है. जबकि एक समय यह 33 फ़ीसदी होने की उम्मीद थी लेकिन जैसा की प्रयावरण मंत्री नटराजन ने कहा कि पिछले आंकड़ों में वास्तव मे गिरावट दर्शाते हैं.
वन क्षेत्र के किनारे तेज़ी से इंसानी ज़रुरतों की भेंट चढ़ रहे हैं. परिणामस्वरुप प्राकृतिक संपदा समाप्ति की ओर है.

तेज़ी से पिघल रहा है ग्लेशियर

ग्लेशियर
अंटार्कटिका का बड़ा ग्लेशियर बहुत तेज़ी से पिघल रहा है.
बीबीसी को ऐसे शोध के बारे में पता चला है जिसके अनुसार अंटार्कटिका के सबसे बड़े ग्लेशियरों में से एक अत्यधिक तेज़ी से पिघल रहा है.
शोध के अनुसार 10 वर्ष पहले यह ग्लेशियर जिस जिस रफ़्तार से पिघल रहा था, उसके मुक़ाबले अब यह चार गुना तेज़ी से पिघल रहा है.
उपग्रह की मदद से लिए गए आंकड़ों के मुताबिक़ पश्चिमी अंटार्कटिका स्थित पाइन आइलैंड ग्लेशियर हर साल 16 मीटर धंस रहा है.
वर्ष 1994 से अब तक ग्लेशियर की सतह 90 मीटर तक नीचे जा चुकी है. इसके कारण समुद्री जल स्तर को लेकर गंभीर परिणाम हो सकते हैं.
ये शोध ब्रितानी वैज्ञानिकों ने किया है और यह जियोफ़िज़िकल रिसर्च लेटर्स में प्रकाशित हुआ है.
शोध करने वाली टीम का नेतृत्व यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन के प्रोफ़ेसर डंकन विंघम ने किया था.
जिस रफ़्तार से ये ग्लेशियर 15 वर्ष पहले पिघल रहा था, उसके आधार पर किए गए आकलन के मुताबिक़ इस ग्लेशियर को क़रीब 600 वर्षों तक रहना था, लेकिन नए आंकड़ों के आधार पर अब ये कहा जा रहा है कि इस ग्लेशियर की उम्र मात्र 100 वर्ष ही रह गई है.
शोध करने वालों में से एक लीड्स विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर एंड्र्यू शेफ़र्ड का कहना है कि ग्लेशियर के बीच में से पिघलने से विश्व भर में समुद्री जलस्तर में क़रीब तीन सेंटीमीटर की बढो़त्तरी होगी.
बीबीसी से बातचीत में प्रोफ़ेसर एंड्र्यू शेफ़र्ड ने कहा कि अंटार्कटिका के इस हिस्से में ऐसा पहले कभी नहीं हुआ है.
उन्होंने कहा, "हम जानते हैं कि ये ग्लेशियर कुछ समय से असंतुलित स्थिति में था, लेकिन ये अब ग्लेशियर बेहद तेज़ी से पिघल रहा है."
बीबीसी के विज्ञान औऱ पर्यावरण संवाददाता डेविड शुकमैन कहते हैं कि पाँच वर्ष पहले पाइन आइलैंड ग्लेशियर का निरीक्षण करने चिली की नौसेना और नासा की एक उड़ान में वो साथ गए थे.
उन्होंने बताया, "ग्यारह घंटों की इस यात्रा में हम इस ग्लेशियर के काफ़ी नज़दीक से उड़े. ये ग्लेशियर 20 मील चौड़ा और कहीं-कहीं एक मील तक गहरा है."
उन्होंने कहा कि उस वक़्त भी उड़ान में सवार शोधकर्ता ग्लेशियर में हो रहे बदलाव की रफ़्तार से चिंतित थे. उपग्रह की मदद से किए गए ताज़ा शोध से ध्रुवीय विशेषज्ञों में चिंता बढेगी.

भारत में मिला घोंसले बनाने वाला मेंढक

मेंढक
मेंढकों की घोंसले बनाने वाली भारतीय प्रजाति अमरीका और अफ्रीका की प्रजाति से भिन्न है
भारत के एक वैज्ञानिक ने मेंढकों की तीन ऐसी दुर्लभ प्रजातियाँ ढूँढने का दावा किया है जो अपने अंडे देने के लिए घोंसले बनाते हैं.
मेंढक की ये प्रजातियां केरल और कर्नाटक की पश्चिमी पहाड़ी श्रंखलाओं के जंगलों में पाई जाती है जहाँ ख़ूब बारिश होती है.
दिल्ली विश्वविद्यालय के डॉक्टर एसडी बीजू का कहना है कि ये छोटे-छोटे मेंढक 12 सेंटीमीटर तक लंबे होते हैं. ये मेंढक अंडे देने के बाद उन्हें गर्मी, शिकारी पक्षियों और कीड़ों से बचाने के लिए घोंसले बनाते हैं.
ये मेंढक पत्तियों को ऊपर से नीचे तक इस तरह से मोड़ते हैं कि उससे अंडे रखने के लिए एक घोंसला बन जाता है और किसी चिपचिपे पदार्थ से उसे मज़बूत भी बना देते हैं ताकि अंडे बाहर ना निकल सकें.
डॉक्टर बीजू का कहना था, "ये दुर्लभ प्रजाति के मेंढक हैं और एशिया भर में सिर्फ़ यहीं पाए जाते हैं."
वैज्ञानिक को दुर्लभ प्रजाति के इन मेंढकों का पता 20 वर्ष के शोध के बाद चला है. यह शोध उन्होंने केरल के वायनाड क्षेत्रों और कर्नाटक के कूर्ग क्षेत्र में किया.
डॉक्टर बीजू का कहना था कि मेंढकों की यह प्रजाति अमरीका और अफ्रीका में पाई जाने वाली उस प्रजाति से भिन्न हैं जो पत्तियों का घोंसला बनाती है क्योंकि उस प्रजाति के मेंढक तब घोंसले बनाते हैं जब उनकी मादाएँ अंडे देती हैं.
डॉक्टर बीजू के अनुसार अमरीका और अफ्रीका में पाई जाने वाली प्रजातियों के मेंढक अंडे देते समय ही घोंसले बनाते हैं जबकि यह काम नर और मादा दोनों साथ मिलकर करते हैं जबकि कॉफ़ी और अन्य तरह के वृक्षों की भरमार होने से इस भारतीय प्रजाति के मेंढकों पर लुप्त होने का ख़तरा मंडराने लगा है.
डॉक्टर बीजू कहते हैं, "आठ वर्ष पहले जब मैंने उस क्षेत्र का दौरा किया था तो ऐसे मेंढकों को रात में ढूँढ पाना आसान था लेकिन हाल के समय में तो नाटकीय बदलाव आया है और अब इस प्रजाति के मेंढकों को ढूँढ पाना बेहद मुश्किल है."

मनुष्यों से न डरने वाला विशालकाय चूहा

विशालकाय चूहा
बीबीसी के एक कार्यक्रम के लिए फ़िल्म बना रहे एक दल को इस चूहे का पता चला है
पपुआ न्यू गिनी के घने जंगलों में एक नई प्रजाति का विशालकाय चूहा पाया गया है जो इंसान से नहीं डरता और दुनिया भर में अभी तक चूहों की ज्ञात प्रजातियों में सबसे बड़ा है.
इस चूहे की लंबाई मुँह से पूँछ तक 82 सेंटीमीटर है और इसका वज़न लगभग डेढ़ किलोग्राम है. बीबीसी के एक कार्यक्रम 'लॉस्ट लैंड ऑफ़ द वोल्कैनो' के लिए फ़िल्म बना रहे एक दल को यह चूहा मिला है.
इस जाँच दल को अपने इस खोज अभियान के दौरान और भी अदभुत चीज़ें मिली हैं लेकिन यह चूहा उन सबमें बिल्कुल चौंकाने वाला है.
देखिए इस विशालकाय चूहे का वीडियो देखिए
समझा जाता है कि चूहे की यह प्रजाति सिर्फ़ बोसावी पहाड़ी इलाक़ों में ही बसती है और यह दुनिया में कहीं और नहीं पाई जाती है.
बीबीसी के खोजी दल के साथ मौजूद रहे पशु विशेषज्ञ डॉक्टर क्रिस्टोफ़र हैलजैन का कहना था, "यह दुनिया भर के सबसे बड़े चूहों में से एक है. यह सही अर्थों में चूहा है, बिल्कुल वैसा ही जैसा आप किसी शहर की नालियों में देखते हैं."
शुरू में इस चूहे को एक इन्फ्रारैड कैमरे के ज़रिए देखा गया जिसे बीबीसी के कैमरामैन गॉर्डन बुचानन ने ज्वालामुखी के ढलान पर मौजूद जंगलों में लगाया था.
बीबीसी की प्रकृति इतिहास इकाई की टीम ने कैमरे के ज़रिए देखा कि यह चूहा विशाल आकार का है जो जंगल में खुला घूम रहा है. टीम के सदस्य इस चूहे के आकार को देखकर आश्चर्यचकित रह गए.
उन्हें तुरंत विचार आया कि हो सकता है कि ये चूहा ऐसी प्रजाति का हो जिसे विज्ञान की दुनिया ने पहले कभी नहीं देखा लेकिन वे यह सुनिश्चित करने के लिए उस चूहे को जीवित देखना चाहते थे.
बस उसके बाद खोजी दल ने जंगल से वाकिफ़ पेशेवर लोगों के साथ तलाश शुरू की और इस चूहे का पता लगा लिया.
बिल्ली जैसा
डॉक्टर बुचानन का कहना था कि उनके पास एक बिल्ली है और वो लगभग इसी चूहे के बराबर है. इस शरीर पर घने बाल हैं जो उसे सर्दियों में भी जीवित रखने में मदद करते हैं.
विशालकाय चूहा
खोजी दल इस चूहे को देखकर चकित और प्रसन्न था
आरंभिक तौर पर इस चूहे को 'बोसावी वूली रैट' नाम दिया गया है लेकिन इसे एक वैज्ञानिक नाम देने के लिए सहमति बनाने की कोशिशें की जा रही हैं. फ़िलीपीन्स में भी ऐसी प्रजाति के चूहे पाए जाते हैं जिनका वज़न दो किलोग्राम तक हो सकता है.
माउंट बोसावी में किसी ज़माने में ज्वालामुखी सक्रिय थे और यह पपुआ न्यू गिनी के दक्षिण ऊँची पहाड़ियों में पड़ता है. यह काफ़ी दूरदराज़ का इलाक़ा है और यहाँ बहुत कम मनुष्य जा पाए हैं.
यह इलाक़ा तरह-तरह के चूहों की प्रजातियों के लिए प्रसिद्ध है. अक्सर शिकारी इन चूहों का शिकार करते हैं और उसे खाते हैं.

कछुए के अंत का कारण मानव

विशालकाय कछुआ
विशालकाय कछुए लाखों वर्षों तक जीवित रहे
एक शोध के मुताबिक क़रीब तीन हज़ार वर्ष पहले विशालकाय कछुए की एक प्रजाति के अंत के लिए मानव जिम्मेदार है.
इस शोध में पहली बार साफ़ तौर पर यह बात सामने आई है कि विशालकाय जंतुओं के अंत में मानव की एक भूमिका रही है.
यह शोध पत्र 'प्रोसिडिंग्स ऑफ़ द नेशनल अकेडमी ऑफ़ साइसेंज ऑफ़ यूनाइटेड स्टेट्स (पीएनएएस)' में प्रकाशित हुआ है.
वानुआतु के एक द्वीप पर ऑस्ट्रेलियाई शोध दल ने कछुए के पैर की हड्डियों को पाया. हालांकि उन्हें वहाँ खोपड़ियाँ वगैरह नहीं मिली.
ये हड्डियाँ मानव के आने के 200 वर्षों के बाद के समय-काल को दर्शाती है. इससे इस बात का अंदाज़ा लगाया जा रहा है कि मानव ने खाने के लिए उनका शिकार किया होगा.
ग़ौरतलब है कि ये कछुए अन्य विशालकाय जंतुओं के मुक़ाबले लंबे समय तक जीवित रहे.
ये कछुए ढाई मीटर लंबे होते थे और उनके सिर पर डरावना सींग होता था.
बेहतरीन काम
ऑस्ट्रेलिया में पाए जाने वाले चर्चित जीव वूलेन मैमोथ (ऊन से ढके रहने वाले, हाथी के आकार-प्रकार के) जहां 50 हज़ार वर्ष पहले ख़त्म हो गए, वहीं ये कछुए काफ़ी लंबे समय तक जीवित रहे. लापिटा नाम से जाने जाने वाले लोगों के आने के बाद इन पर ख़तरा मंडराने लगा.
लाखों वर्षों तक ये जीव इस द्वीप पर जीवित रहे लेकिन जैसे ही इन लोगों ने वहाँ बसेरा बनाया कुछ सौ वर्षों के अंदर ही ये ग़ायब हो गए
एक्सटर विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर क्रिस टरनी
चार्ल्स डार्विन ने चिली में जब पहली बार विशालकाय जीव के अवशेष पाए थे, तब से लेकर इन 150 वर्षों में विशालकाय जीवों के लापता होने के कारणों के बारे में काफ़ी बहस होती रही है.
इनमें जलवायु परिवर्तन से लेकर मानव के प्रभाव और सब कुछ ख़त्म कर देने वाले उल्का पिंड को जिम्मेदार माना जाता रहा है.
लंदन के एक्सटर विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर क्रिस टरनी ने बीबीसी से बातचीत में कहा, "लाखों वर्षों तक ये जीव इस द्वीप पर जीवित रहे लेकिन जैसे ही इन लोगों ने वहाँ बसेरा बनाया कुछ सौ वर्षों के अंदर ही ये ग़ायब हो गए."
उन्होंने इसे 'एक बेहतरीन काम बताया' है.

ख़तरे में है समुद्री जीवन !

दुनियाभर में समुद्रों के हालात को लेकर जारी एक रिपोर्ट में कहा गया है कि समुद्रों के हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं और समुद्री जीवों के विलुप्त होने का ख़तरा आशंका से कहीं अधिक तेज़ी से बढ़ रहा है.
‘इंटरनेशनल प्रोग्राम ऑन स्टेट ऑफ ओशियंस’ नाम की इस रिपोर्ट में एक अध्ययन के हवाले से कहा गया है कि दुनियाभर में समुद्रों के हालात बद से बदतर हैं.
रिपोर्ट के मुताबिक समुद्रों को इस दुर्दशा से बचाने के लिए मछलियों के ज़रूरत से ज़्यादा शिकार, प्रदूषण और कार्बन उत्सर्जन में कमी और विलुप्त हो रही प्रजातियों के संरक्षण जैसे क़दम उठाने होंगे.
रिपोर्ट के मुताबिक समुद्रों को इस दुर्दशा से बचाने के लिए जल्द से जल्द कुछ क़दम उठाने की ज़रूरत है. इनमें, मछलियों के ज़रूरत से ज़्यादा शिकार पर रोक, प्रदूषण और कार्बन उत्सर्जन में कमी और विलुप्त हो रही प्रजातियों के संरक्षण जैसे सुझाव शामिल हैं.

ज़रूरी क़दम

यह रिपोर्ट इस सप्ताह के अंत कर संयुक्त राष्ट्र के सामने पेश की जाएगी और इस पर विचार-विमर्श के लिए अलग-अलग विषयों से जुड़े वैज्ञानिक आगे आएंगे.
बीबीसी संवाददाता रिचर्ड ब्लैक के मुताबिक रिपोर्ट में साफ़ तौर पर यह कहा गया है कि समुद्रों के हालात में किए गए आकलन से कहीं अधिक तेज़ी से गिरावट आ रही है.
कोरल रीफ़ के खात्मे, समुद्री जीवों की दुर्लभ प्रजातियों के शिकार और तेज़ी से पिघलती बर्फ़ ने कई ऐसे खतरे पैदा कर दिए हैं जिनसे समय रहते निपटना ज़रूरी है.
अनुसंधानकर्ताओं के मुताबिक पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाले घटकों ने एक तरह से साथ मिलकर इस नुकसान और खतरे को बढ़ा दिया. अनुसंधानकर्ताओं ने माना है कि वैज्ञानिकों को इस घटनाक्रम का अंदाज़ा नहीं था.

एलियंस के अस्तित्व पर हॉकिंग की मुहर

प्रोफ़ैसर स्टीवन हॉकिंग
स्टीवन हॉकिंग का कहना है कि मानव को दूसरे ग्रहों के प्राणियों से सम्पर्क करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए
इस ब्रह्मांड के दूसरे ग्रहों में प्राणी अवश्य ही हैं लेकिन लोगों को उनसे बचकर रहना चाहिए. ये चेतावनी है ब्रिटेन के जाने-माने वैज्ञानिक स्टीवन हॉकिंग की.
टेलीविज़न के डिस्कवरी चैनल पर एक सिरीज़ दिखाई जा रही है जिसमें स्टीवन हॉकिंग ने माना कि यह पूरी तरह से तार्किक है कि बौद्धिक प्राणी अन्य ग्रहों पर भी होंगे.
उन्होंने कहा कि संभव है कि वो संसाधनों की तलाश में पृथ्वी पर हमला करें और फिर आगे बढ़ जाएं.
उन्होने कहा, "अगर एलियन पृथ्वी पर आते हैं तो उसका वैसा ही परिणाम होगा जैसा कोलम्बस के अमरीका पहुंचने पर वहां के मूल निवासियों का हुआ था".
स्टीवन हॉकिंग मानते हैं कि दूसरे ग्रहों के प्राणियों से संपर्क करने की कोशिश करने से बेहतर ये होगा कि हम उससे बचें.
इसकी व्याख्या करते हुए उन्होने कहा, "इसके लिए हमें अपने आपको देखने की ज़रूरत है कि बौद्धिक जीव का विकास उस शक्ल में हो सकता है जिससे हम न मिलना चाहें".
अतीत में मानव ने अंतरिक्ष में ऐसे खोजी यान भेजे हैं जिनमें मानव के नक्काशीदार चित्र और पृथ्वी की स्थिति बताने वाले नक्शे रखे हुए थे.
अगर एलियन पृथ्वी पर आते हैं तो उसका वैसा ही परिणाम होगा जैसा कोलम्बस के अमरीका पहुंचने पर वहां के मूल निवासियों का हुआ था.
स्टीवन हॉकिंग
इसके अलावा अंतरिक्ष में रेडियो संकेत भी भेजे गए हैं जिससे वो किसी एलियन सभ्यता तक पहुंच सकें.
स्टीवन हॉकिंग ने कहा कि इस ब्रह्मांड में अनगिनत आकाशगंगाएं हैं इसलिए यह सोचना कि उनमें कहीं न कहीं जीवन होगा बिल्कुल तार्किक है.
उन्होंने कहा, "सबसे बड़ी चुनौती यह पता करना है कि वो देखने में कैसे होंगे".
डिस्कवरी चैनल पर दिखाई जाने वाली इस सिरीज़ में कई तरह के जीवों की कल्पना की गई है जिनमें दो पैरों पर चलने वाले शाकाहारी जीव से लेकर शिकार करने वाले छिपकलीनुमा जीव शामिल हैं.
लेकिन स्टीवन हॉकिंग का मानना है कि इस ब्रह्मांड में जीवन साधारण सूक्ष्म जीवाणुओं वाला ही होगा.
हमारे सौर मंडल पर तैयार की गई बीबीसी की एक सिरीज़ में मैनचैस्टर विश्वविद्यालय में भौतिकी के प्रोफ़ेसर ब्रायन कॉक्स ने कहा था कि हमारे सौर मंडल में भी जीवन हो सकता है.
उनका कहना था कि बृहस्पति ग्रह के एक चंद्रमा यूरोपा में जो बर्फ़ की परतें जमा हैं उनके नीचे सूक्ष्म जीव हो सकते हैं.

क्या दूसरे ग्रहों में पनप सकता है जीवन?

 गुरुवार, 24 नवंबर, 2011 को 08:23 IST तक के समाचार

परिकल्पित एलियन
तरह-तरह के एलियन की परिकल्पनाएँ की गई हैं
क्या दूसरे ग्रहों में भी जीवन है? क्या वहाँ भी उसी तरह से लोग रहते हैं जिस तरह से पृथ्वी में रहते हैं? क्या वहाँ भी पृथ्वी की तरह की जीवन परिस्थितियाँ हैं?
दूसरे ग्रहों के जीवों (एलियन्स) और उनके कथित यानों को लेकर न केवल बहुत सी विज्ञान कथाएँ लिखी गई हैं और फ़िल्में बनी हैं, इन सवालों ने वैज्ञानिकों को भी लगातार काम पर लगाए रखा है.
अब दूसरे ग्रहों पर जीवन की संभावनाओं पर काम कर रहे वैज्ञानिकों ने एक ठोस काम किया है. उन्होंने ने एक सूची तैयार की है कि किन ग्रहों और किन चंद्रमाओं पर जीवन होने की संभावना है.
वैज्ञानिक कह रहे हैं कि हमारे सौरमंडल के शनि ग्रह का चंद्रमा टाइटन और हमारे सौर मंडल से बाहर का एक ग्रह 'ग्लीज़ 581जी' में जीवन की सबसे अधिक संभावना हो सकती है.
ये दोनों पृथ्वी से 20.5 प्रकाश वर्ष की दूरी पर हैं. एक प्रकाश वर्ष यानी वह दूरी जो प्रकाश की गति से एक वर्ष में तय की जा सकती है. एक प्रकाश वर्ष में लगभग 10 खरब किलोमीटर होते हैं.

सूची

वैज्ञानिकों की एक अंतरराष्ट्रीय टीम ने दूसरे ग्रहों में जीवन की संभावना के लिए दो तरह की सूची तैयार की है.

पृथ्वी से समानता सूचकांक

पृथ्वी और चंद्रमा
  • पृथ्वी - 1.00
  • ग्लीज़ 581जी - 8.89
  • ग्लीज़ 581डी - 0.74
  • ग्लीज़ 581सी - 0.70
  • मंगल - 0.70
  • बुध - 0.60
  • एचडी 69830 - 0.60
  • 55 सीएनसी सी - 0.56
  • चंद्रमा - 0.56
  • ग्लीज़ 581ई - 0.53
एक सूची उन ग्रहों या चंद्रमाओं की है जो पृथ्वी जैसे हैं इसे 'अर्थ सिमिलरिटी इंडेक्स (ईएसआई)' का नाम दिया गया. दूसरी सूची उनकी जहाँ जीवन पनपने की संभावना दिखती है, इसे 'प्लैनेटरी हैबिटैबिलिटी इंडेक्स (पीएचआई)' का नाम दिया गया.
वैज्ञानिकों का ये शोध खगोल जीवविज्ञान की एक पत्रिका में प्रकाशित हुआ है.
इस शोधपत्र के सहलेखक, अमरीका की वॉशिंगटन स्टेट यूनिवर्सिटी के डॉ डिर्क शुल्ज़ माकश कहते हैं, "चूंकि हम अपने अनुभवों से जानते हैं कि पृथ्वी जैसी परिस्थितियाँ हों तो वहाँ जीवन पनप सकता है इसलिए पहला सवाल ये था कि क्या किसी और दुनिया में पृथ्वी जैसी परिस्थितियाँ हैं?"
वे कहते हैं, "दूसरा सवाल ये था कि किसी और सौरमंडल में क्या कोई ऐसा ग्रह है जहाँ ऐसा मौसम है कि वहाँ किसी और रूप में जीवन पनप सकता है, चाहे उसकी जानकारी हमें हो या न हो."
जैसा कि सूचियों के नाम से स्पष्ट है, पहली श्रेणी ईएसआई में उन ग्रहों को रखा गया जो पृथ्वी की तरह हैं. इसमें उनके आकार, घनत्व और अपने मातृ ग्रह से दूरी को ध्यान में रखा गया.
जबकि दूसरी सूची यानी पीएचआई में दूसरे पैमाने रखे गए, जैसे कि उस दुनिया का मौसम कैसा है, उसकी सतह चट्टानी है या बर्फ़ीली, वहाँ वायुमंडल है या चुंबकीय क्षेत्र मौजूद है या नहीं आदि.

परिस्थितियाँ

वैज्ञानिकों ने अपने शोध में इसका भी अध्ययन किया कि किसी ग्रह में जीवों के लिए किसी तरह की ऊर्जा उपलब्ध है.

जीवन पनपने की संभावना सूचकांक

टाइटन
  • टाइटन - 0.64
  • मंगल - 0.59
  • यूरोपा - 0.49
  • ग्लीज़ 581जी - 0.45
  • ग्लीज़ 581डी - 0.43
  • ग्लीज़ 581सी - 0.41
  • वृहस्पति - 0.37
  • शनि - 0.37
  • शुक्र 0.37
  • एंसेलैडस - 0.35
ये ऊर्जा मातृ ग्रह से रोशनी की तरह भी मिल सकती है या फिर गुरुत्वाकर्षण जैसी कोई शक्ति हो जिसकी वजह से ग्रह या चंद्रमा पर चीज़ों के परस्पर रगड़ से ऊर्जा उत्पन्न होने की संभावना हो.
जब इन परिस्थियों पर विचार हुआ तो रसायन शास्त्र को वरीयता दी गई, मसलन क्या उस ग्रह या चंद्रमा में कोई कार्बनिक यौगिक पदार्थ मौजूद है या कोई ऐसा तरल पदार्थ मौजूद है जो व्यापक रासायनिक क्रिया करने में सक्षम हो?
ईएसआई यानी पृथ्वी से समानता वाली सूची में सबसे अधिक अंक 1.00 दिया गया, जो कि ज़ाहिर तौर पर पृथ्वी के लिए था लेकिन दूसरे नंबर पर ग्लीज़ 581जी आया जिसे 0.89 अंक मिले. ये ग्रह हमारे सौरमंडल से बाहर है और कई वैज्ञानिकों को इसके अस्तित्व पर ही संदेह है. इसके बाद इससे मिलता जुलता ही एक ग्रह ग्लीज़ 581डी आया जिसे 0.74 अंक मिले.
हमारे अपने सौर मंडल में जिन ग्रहों को सबसे ज़्यादा अंक मिले उनमें मंगल (0.70 अंक) और बुध (0.60 अंक) हैं.
जबकि उन ग्रहों या चंद्रमाओं में जो पृथ्वी की तरह तो नहीं हैं लेकिन फिर भी वहाँ जीवन हो सकता है, सबसे अधिक 0.64 अंक मिले शनि के चंद्रमा टाइटन को, दूसरे मंगल (0.59 अंक) को और तीसरे वृहस्तपति (0.47 अंक) को.

संभावना

वैज्ञानिकों का कहना है कि हाल के वर्षों में ऐसे ग्रहों की तलाश में तेज़ी आई है जहाँ जीवन होने की संभावना हो सकती है.
नासा ने वर्ष 2009 में केप्लर स्पेस टेलिस्कोप अंतरिक्ष की कक्षा में स्थापित किया था. इस टेलिस्कोप ने अब तक एक हज़ार ऐसे ग्रहों या चंद्रमाओं का पता लगाया है जहाँ जीवन पनपने की संभावना हो सकती है.
उनका कहना है कि भविष्य में जो टेलिस्कोप बनेंगे, उनमें ये क्षमता भी होगी कि वह किसी ग्रह में जैविक पदार्थों से निकलने वाली रौशनी को पहचान सके.
उदाहरण के तौर पर क्लोरोफ़िल की उपस्थिति जो किसी भी पेड़-पौधे में मौजूद अहम तत्व होता है.

एक ग्रह जिसपर चार बार होता है सूर्योदय!

 मंगलवार, 16 अक्तूबर, 2012 को 08:41 IST तक के समाचार

अंतरिक्ष विज्ञान में रुचि रखने वाले दो शौकिया वैज्ञानिकों ने एक ऐसे ग्रह की खोज की है जिस पर चार सूर्य मौजूद है.
इनमें से दो सूर्य ग्रह की कक्षा में मौजूद हैं और दो सूर्य इस ग्रह का चक्कर लगा रहे हैं.
"इस ग्रह पर मौजूद सूर्य रुपी चार तारे इसके गुरुत्वाकर्षण को बेहद जटिल बनाते हैं.इसके बाद भी यह ग्रह और इसके सूर्य अरनी कक्षा में चक्कर लगा रहे हैं."
यह ग्रह पृथ्वी से 5000 प्रकाश वर्ष दूर है और माना जा रहा है कि आकार में पृथ्वी से छह गुना बड़ा है.
अनुसंधानकर्ताओं के मुताबिक फिलहाल यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि चार सूर्य मौजूद होने के बावजूद इस ग्रह का गुरुत्वाकर्षण प्रभावित क्यों नहीं होता.
शौकिया वैज्ञानिकों ने 'प्लैनेटहंटर्स वेबसाइट' की मदद से इस ग्रह की खोज की. इसके बाद केक प्रयोगशाला के वैज्ञानिकों ने इस खोज को आगे बढ़ाया.
इस ग्रह को पीएच1 का नाम दिया है. ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से जुड़े क्रिस लिनटॉट के मुताबिक, ''इस ग्रह पर मौजूद सूर्य रुपी चार तारे इसके गुरुत्वाकर्षण को बेहद जटिल बनाते हैं.इसके बाद भी यह ग्रह और इसके सूर्य अरनी कक्षा में चक्कर लगा रहे हैं.''
वैज्ञानिकों का कहना है यह खोज इस मायने में अपने आप में अनूठी है और वो इस जटिल प्रक्रिया को देखकर बेहद हैरान हैं.
लिनटॉन के मुताबिक तारों और ग्रहों की खोज में लगे कंप्यूटर इस ग्रह के बारे कोई जानकारी नहीं दे पाए. यह इस बात का संकेत देता है कि ऐसे बहुत से और ग्रह भी मौजूद हो सकते हैं जिनकी खोज के लिए वैज्ञानिकों या शौकिया खोजकर्ताओं को आगे आना होगा.
जिस वेबसाइट के ज़रिए इस ग्रह की खोज की गई है वो कई शोकिया वैज्ञानिकों के लिए ब्रह्मांड संबंधी अपनी जानकारियों और तारों की खोज के हुनर को आजमाने का ज़रिया है.