मंगलवार, 4 दिसंबर 2012

परमाणु युग हुआ 70 साल का
मंगलवार, 4 दिसंबर 2012( 13:42 IST )

Webdunia
भारत में उस समय 3 दिसंबर की तारीख शुरू हो चुकी थी। अमेरिका में अभी 2 दिसंबर 1942 का तीसरा प्रहर चल रहा था, जब खबर आई की परमाणु के नियंत्रित सतत विखंडन में सफलता मिल गई है। शिकागो में पहली बार मिली इस सफलता को ही परमाणु बिजली व परमाणु बम के युग का जन्मदिन माना जाता है।

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अणु से भी कहीं छोटे परमाणु को भी विखंडित किया जा सकता है, यह तो 1938 का अंत आते-आते पता चल गया था। जर्मनी के दो भौतिकशास्त्रियों ओटो हान और फ्रित्स श्ट्रासमान को यह देख कर बड़ा आश्चर्य हुआ था कि यूरेनियम का नाभिक उस समय टूट कर बिखरने लगता है और दूसरे रासायनिक तत्वों में बदल जाता है, जब उस पर न्यूट्रॉन कणों की बौछार की जाती है।

अगला प्रश्न यह था कि नाभिकीय विखंडन की इस अज्ञात क्रिया को क्या एक सतत क्रिया (चेन-रिएक्शन) का भी रूप दिया जा सकता है? न केवल दुनिया भर के भौतिकीविद ही इस सतत क्रिया का सुराग पाने में जुट गए, यूरोप और अमेरिका के सैन्य अधिकारियों और राजनेताओं के भी कान खड़े हो गए। विज्ञान और राजनीति के बीच तब जो मिलीभगत शुरू हुई, वह इतिहास में पहले कभी देखने में नहीं आई थी।

कैसे होता है परमाणु विखंडनः सिद्धांत रूप में, किसी न्यूट्रॉन कण को तेज गति से यूरेनियम के किसी नाभिक पर दागने से वह नाभिक दो या तीन नए न्यूट्रॉन कण पैदा करते हुए खंडित हो जाता है। ये नए न्यूट्रॉन कण किसी दूसरे नाभिक से टकरा सकते हैं और उसे तोड़ कर फिर से नए न्यूट्रॉन कण पैदा कर सकते हैं।

यदि न्यूट्रान कणों की हर बार एक सही गति हो और यूरेनियम की एक तथातथित सही 'क्रांतिक मात्रा' (क्रिटिकल मास) हो, तो यह क्रिया स्वतः ही चल पड़ती है और हर नाभिक के टूटने के साथ भारी मात्रा में ऊर्जा भी पैदा करती है। किसी रिएक्टर में नियंत्रित होने पर यही ऊर्जा बिजली बनाने के काम आ सकती है जबकि किसी बम में बंद होने पर प्रलयंकारी विध्वंस मचा सकती है।

1938 में जर्मनी हिटलर के शिकंजे में था। यूरोप में द्वितीय विश्व युद्ध के बादल घिरने शुरू हो गए थे। यहूदियों और अपने हर तरह के विरोधियों का सफाया कर देने के हिटलर के संकल्प के कारण जर्मनी के अल्बर्ट आइनश्टाइन और हंगरी के लेओ शिलार्द जैसे चोटी के वैज्ञानिकों को भाग कर अमेरिका में शरण लेनी पड़ी थी। दोनो यहूदी थे। शिलार्द ने तो ओटो हान के परमाणु विखंडन से करीब 5 साल पहले ही भविष्यवाणी कर दी थी कि एक बार शुरू हो जाने पर स्वतः परमाणु विखंडन की सतत क्रिया भी संभव है।

हिटलर की भूमिकाः हिटलर के अत्याचारों से बचने के लिए जर्मनी से भागे वैज्ञानिकों व अन्य वैज्ञानिकों को उन दिनों यही चिंता सता रही थी कि कहीं ऐसा न हो कि जर्मनी उनसे पहले परमाणु के सतत विखंडन का रहस्य जान ले और शायद पहला परमाणु बम भी बना ले। तब तो बेड़ा गर्क ही हो जाएगा। अतः वे पूरे जोर-शोर से जर्मनी से पहले ही यह रहस्य जान लेना और जर्मनी से आगे बढ़ जाना चाहते थे।

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यही बेचैनी इटली के एनरीको फेर्मी को भी थी। उन्हें 1938 में परमाणु भौतिकी में उनके शोधकार्यों के लिए नोबेल पुरस्कार भी मिला था। उनके सामने भी समस्या यह थी कि उनकी पत्नी यहूदी थी और उस समय इटली में हिटलर के परम मित्र बेनीतो मुसोलिनी की ासिस्ट सरकार की अत्याचारशाही थी। नोबेल पुरस्कार लेने के बहाने से फेर्मी सपरिवार देश छोड़ कर भागने और अमेरिका में शरण पाने में सफल रहे।

अमेरिका पहुंचते ही फेर्मी एक ऐसा रिएक्टर बनाने में जुट गए, जिसके माध्यम से वे दिखाना चाहते थे कि सतत परमाणु विखंडन की क्रिया को नियंत्रित भी किया जा सकता है।

इस बीच हिटलर ने पहली सितंबर 1939 को पोलैंड पर आक्रमण कर द्वितीय विश्व युद्ध का बिगुल भी बजा दिया था। अमेरिका सजग तो हो गया था, लेकिन युद्ध में लगभग तीन साल बाद तब शामिल हुआ, जब जापान ने उसके नौसैनिक अड्डे पर्लहार्बर पर बमबारी करदी।

अमेरिका इस हमले से ऐसा बौखलाया कि वह पहला परमाणु बम बनाने के अपने तथाकथित 'मैनहटन प्रॉजेक्ट' को मूर्तरूप देने पर तुरंत जुट गया।

पहला परमाणु रिएक्टरः 1942 में लगभग उसी समय एनरीको फेर्मी और लेओ शिलार्द की बनाई रूपरेखा के आधार पर शिकागो के एक स्टेडियम के स्क्वैश हॉल में वह पहला परमाणु रिएक्टर भी बन कर तैयार हुआ, जिसमें पहली बार परमाणु विखंडन की नियंत्रित सतत क्रिया का प्रदर्शन किया जाना था। रिएक्टर एक-दूसरे पर रखी ग्रेफाइट और यूरेनियम की टनों भारी परतों का बना था। ग्रेफाइट परतों का काम था न्यूट्रॉन कणों की बौछार की गति को घटाते हुए सही सीमा के भीतर रखना। परमाणु विकिरण से रक्षा के बारे में बहुत कम ही सोचा गया था।

दोनों वैज्ञानिक कैडमियम के एक घोल से भरी कुछ बाल्टियां लिए बैठे थे, ताकि कोई आपात स्थिति पैदा होने पर वे यह घोल रिएक्टर पर उड़ेल कर सतत विखंडन की क्रिया को रोक सकें। कैडमियम क्योंकि न्यूट्रॉन कणों को सोख लेता है, इसलिए वे उसके द्वारा सोख लिए जाने पर यूरेनियम के नाभिकों से नहीं टकरा पाते और तब विखंडन की क्रिया ठंडी पड़ जाती।

शिकागो में 2 दिसंबर 1942 की सुबह यह प्रयोग शुरू हुआ। फेर्मी के आदेश पर दोपहर में कुछ देर आराम के लिए काम रोक दिया गया। बाद में जब प्रयोग आगे बढ़ा, तब स्थानीय समय के अनुसार तीसरे पहर तीन बज कर 20 मिनट पर न्यूट्रॉन कणों द्वारा यूरेनियम के नाभिक तोड़ने, नए न्यूट्रॉन कण पैदा करने और फिर नए नाभिक तोड़ने और नए न्यूट्रॉन पैदा करने की सतत क्रिया चल पड़ी।

इस तरह यह पहली बार सिद्ध हो गया कि परमाणु विखंडन की क्रिया को ऐसे भी शुरू एवं नियंत्रित किया जा सकता है कि एक बार शुरू हो कर वह अपने आप चलती रही। लेकिन, स्वतः चलने वाली यह सतत क्रिया तभी शुरू होती है, जब यूरेनियम जैसे विखंडनीय पदार्थ की क्रांतिक मात्रा कहलाने वाली एक निश्चित मात्रा भी मौजूद हो।

रिएक्टर के बाद बम : इस प्रयोग की सफलता के बाद फेर्मी, शिलार्द और उनके साथी वैज्ञानिक परमाणु बम वाली मैनहटन परियोजना को सफल बनाने में जुट गए। उसकी परिणति 6 और 9 अगस्त 1945 को जापान के हिरोशिमा और नागासाकी पर दो अमेरिकी परमाणु बमों के गिराने से हुई अपू्र्व प्रलयलीला के रूप में दुनिया के सामने आई।

किंतु, दुनिया अमेरिका की चाहे जितनी निंदा-भर्त्सना करे, असली दोषी तो वह हिटलर था, जिसने 6 वर्ष पूर्व पोलैंड पर अकारण आक्रमण कर विश्वव्यापी युद्ध की आग जलाई थी। शिलार्द बम के इस्तेमाल के पक्ष में नहीं थे, जबकि फेर्मी पक्ष में थे। दोनों को इस बात का भी श्रेय दिया जाता है कि उनके बनाए पहले रिएक्टर ने ही परमाणु ऊर्जा को बिजली में बदलने का मार्ग भी प्रशस्त किया।

लेकिन आज, परमाणु युग का सूर्योदय होने के 70 साल बाद, यह युग गर्व से अधिक शोक का विषय बन गया है। सारी दुनिया में उसके सूर्यास्त की मन्नत मानाई जा रही है। हिरोशिमा और नागासाकी यदि बम-विभिषिका की दारुण गाथा गा रहे हैं तो चेर्नोबिल और फुकूशिमा रिएक्टर-विस्फोट की त्रासदी सुना रहे हैं।

मंगलवार, 6 नवंबर 2012


Tuesday, November 06, 2012 
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सौ से ज्यादा ‘उड़नतश्तरी’ देखी गईं

Tuesday, November 06, 2012, 17:08

सौ से ज्यादा ‘उड़नतश्तरी’ देखी गईं
नई दिल्ली : जम्मू कश्मीर और पूर्वोत्तर में चीन सीमा से लगे इलाकों में सैनिकों ने पिछले तीन महीनों में सौ से ज्यादा ‘उड़नतश्तरी’ या यूएफओ देखे हैं। सेना, डीआरडीओ, एनटीआरओ और आइटीबीपी समेत एजेंसियां अब तक इस चमकीली ‘उड़नतश्तरी’ की पहचान नहीं कर पायी है।

सैन्य अधिकारियों ने यहां बताया कि करगिल -लेह से लगे इलाके में तैनात 14 कॉर्प्स ने सेना मुख्यालय को इस संबंध में एक रिपोर्ट भेजी है कि ठाकोंग में पांगोंग सो झील के निकट आईटीबीपी इकाई ने इन यूएफओ को देखा है।

रिपोर्ट के मुताबिक यह तश्तरी चीन की तरफ से आते हुए धीरे धीरे आसमान की ओर जाकर तीन से पांच घंटे में गायब हो जाती है। अधिकारियों ने इस बात की पुष्टि की कि ये यूएफओ चीनी ड्रोन या उपग्रह नहीं था। इसकी पहचान के लिए एक खास तरह के रडार उपकरण का भी इस्तेमाल किया गया लेकिन कुछ पता नहीं चल पाया।

सेना अधिकारियों ने इसकी पहचान नहीं हो पाने पर चिंता भी जाहिर की है। कुछ लोगों का मानना है कि यह चीन का कोई निगरानी उपकरण हो सकता है। (एजेंसी)

…तो एलियन होते भी हैं या नहीं?

Monday, November 05, 2012, 19:34
…तो एलियन होते भी हैं या नहीं?
लंदन : ब्रिटेन में अज्ञात हवाई वस्तुओं (अनआईडेंटिफाईड फ्लाइंग ऑब्जेक्ट्स या यूएफओ) के समर्थकों ने ‘उड़न वस्तुओं’ की संख्या में आती कमी और परग्रही जीवन के बारे में सबूतों के अभाव की वजह से यह मान लिया है कि शायद एलियनों (दूसरे ग्रहों के निवासी) जैसी कोई चीज होती ही न हो।

टेलीग्राफ की खबर के अनुसार, उड़नवस्तु समर्थकों ने माना कि वे उड़ने वाली इन अज्ञात वस्तुओं के बारे में कोई सबूत मुहैया कराने में असफल रहे हैं और उड़न तश्तरियों के दिखने में आई कमी से मालूम पड़ता है कि एलियन कुछ होता ही नहीं है और इसका मतलब यह है कि यूफोलॉजी (अज्ञात उड़न वस्तुओं का अध्ययन) का अंत अगले दशक में हो सकता है।

इन उड़न तश्तरियों व अन्य उड़न वस्तुओं में रुचि लेने वाले दर्जनों समूह रुचि के अभाव में पहले ही बंद हो चुके हैं। इन वस्तुओं के शोध से जुड़ी ब्रिटेन की एक अग्रणी संस्था अगले सप्ताह यह चर्चा करने के लिए एक बैठक का आयोजन कर रही है कि इस विषय का आगे कोई भविष्य है भी या नहीं।

एसोसिएशन फॉर द साइंटिफिक स्टडी ऑफ एनोमेलस फिनोमिना (एस्सैप) के अध्यक्ष डेव वुड ने कहा कि यह बैठक इस विषय पर आए संकट और इसके संभावित भविष्य के बारे में चर्चा के लिए बुलाई गई है।

उन्होंने अखबार से कहा, ‘संभव है कि अगले दस सालों में इस विषय का कोई अस्तित्व ही न रहे।’ एस्सैप के पास अज्ञात उड़न वस्तुओं से जुड़े मामलों की संख्या में 1988 के बाद से 96 प्रतिशत की कमी आई है जबकि इन शोधों में लगे समूहों की संख्या 1990 के दौरान 100 से ज्यादा थी और अब गिरकर यह लगभग 30 ही रह गई है।

इस पूरे मसले पर वोरकेस्टर विश्वविद्यालय में एक बैठक में चर्चा की जाएगी और इसके निष्कषरें को एसोसिएशन की पत्रिका ‘एनोमली’ के अगले अंक में प्रकाशित किया जाएगा। (एजेंसी)

बुधवार, 24 अक्टूबर 2012

क्या ख़ुदा का कहीं वजूद है?

 रविवार, 21 अक्तूबर, 2012 को 17:55 IST तक के समाचार

बिग बैंग
हाल में हुए 'ईश्वरीय कण' की खोज इतनी अहम घटना है कि स्विट्ज़रलैंड स्थित सर्न प्रयोगशाला के संग्रहालय में चले रहे प्रदर्शनी में अधिक स्थानों पर वो अभी भी छाया हुआ है.
प्रदर्शनी में एक लघू-फ़िल्म भी मौजूद है जिसमें विश्व की उत्पत्ति के सिद्घांतों से संबंधित चित्रों को दिखाया गया है.
फ़िल्म शुरू होने पर एक आवाज़ आती है: 'क्या हम हिग्स बोसोन या ईश्वरीय कण को ढ़ूंढ़ पाएंगे?'
अब जबकि हिग्स की खोज पूरी हो चुकी है - एक ऐसी वैज्ञानिक खोज जो हमें बिग बैंग के फ़ौरन बाद के क्षणों के सबसे क़रीब लाती है; सर्न ने अपने दरवाज़े विद्वानों के लिए खोल दिए हैं जो विश्व की उत्पत्ति पर चिंतन-मनन कर रहे हैं.
पंद्रह अक्तूबर को धर्मशास्त्रियों, दार्शनिकों और भौतिकशास्त्रियों के एक समूह ने इसी मामले पर जेनेवा में एक बैठक की.

'ख़ुदा का सवाल'

लेकिन भौतिकशास्त्रियों के लिए बिग बैंग के पहले का वक़्त एक मुश्किल भरा सिंद्धांत है.
ये एक ऐसा क्षेत्र है जिसे लेकर अनुमान ही लगाया जा सकता है. तो क्या ये एक ऐसा क्षेत्र है जिसपर विज्ञान और धर्म में समझौता हो सकता है?
अरिज़ोना विश्वविद्यालय में 'उत्पत्ति प्रोजेक्ट' के प्रमुख और भौतिकशास्त्री लॉरेंस क्रास कहते हैं, "इस तरह की बैठकों से ये आभास होता है कि वैज्ञानिक ख़ुदा के सवाल पर ग़ौर करते हैं."
हिग्स बोसोन (फ़ाइल)
ये बहस हिग्स बोसोन की खोज के बाद शुरू हुई है.
"विज्ञान की ताक़त उसकी अनिश्चितता में है. सभी कुछ अनिश्चित है. लेकिन विज्ञान उस अनिश्चितता को परिभाषित कर सकता है."
"इसलिए विज्ञान में प्रगति होती है, लेकिन धर्म में नहीं."

विरोधाभास

लेकिन ये सोच की विज्ञान और मज़हब परस्पर-विरोधी हैं, बैठक में वाद-विवाद के विषय बने रहे.
जॉन लेनोक्स ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय में गणित के प्रोफ़ेसर हैं. लेकिन वो ख़ुद को एक ईसाई भी बताते हैं. वो मानते हैं कि मानव में गणित सीखने और सुलझाने की प्रवृति ख़ुदा की मौजूदगी को प्रमाणित करती है.
वो कहते हैं, "मेरे हिसाब से नास्तिकता तार्किकता का अवमूल्यन करता है जो विज्ञान के पहलूओं को समझने के लिए ज़रूरी है."
लेकिन सर्न का कहना है कि वो चाहता है कि दोनों पक्ष एक दूसरे के तर्कों को समझें.

दिशा

ऑक्सफोर्ड के ईयान रैमसे सेंटर फॉर साइंस एंड रिलीजन के निदेशक एंड्यू पिंसेंट का कहना है कि दार्शनिक सदियों से सत्य की खोज करते आए हैं.
हालांकि एक दूसरा पक्ष है कि जो लोग धर्म में यक़ीन रखते हैं वो सवाल करने से पहले ही मानते हैं कि उन्हें इसका जवाब मालूम है जबकि विज्ञान के मामले में ये बिल्कुल उलट है.
लेकिन वहीं एक और पक्ष ये भी है कि हालांकि धर्म विज्ञान के क्षेत्र में कोई नया सत्य नहीं जोड़ सकता है, लेकिन वो विश्व को लेकर हमारे ज्ञान को दिशा प्रदान कर सकता है.

हिलती धरती के पीछे की वजह क्या है?

 मंगलवार, 23 अक्तूबर, 2012 को 11:24 IST तक के समाचार

स्पेन में भूकंप
स्पेन में आए भूकंप के अध्ययन ने एक नई बहस छेड़ दी है.
स्पने के शहर लॉर्का में 2011 में आए भूकंप का अध्ययन कर रहे वैज्ञानिकों का कहना है कि वहां भू-जल के अत्यधिक दोहन को भूकंप के लिए ज़िम्मेदार ठहराया जा सकता है.
सैटेलाइट के ज़रिए भूकंप प्रभावित इलाक़े की ली गई तस्वीरें से वो ये जानने में सफल हुए कि ज़मीन के किस हिस्से में हलचल हुई थी और कौन सा हिस्सा अपनी जगह से हट गया था.
वैज्ञानिकों के अध्ययन से पता चला है कि किस तरह बोरिंग के ज़रिए वर्षों तक ज़मीन से पानी निकालने से भूकंप आने का ख़तरा बढ़ सकता है.
यूनिवर्सिटि ऑफ़ वेस्टर्न ऑनटेरियो के प्रोफ़ेसर पैब्लो गॉनज़ालेज़ और उनके सहयोगियों ने सैटेलाइट रेडार के ज़रिए भेजे गए आंकड़ों के अध्ययन के बाद पाया कि स्पेन के शहर लॉर्का में आए भूकंप में ज़मीन के केवल तीन किलोमीटर नीचे ज़मीन का एक हिस्सा अपनी जगह से फिसला था .
वैज्ञानिकों के अनुसार इसी कारण भूकंप की तीव्रता केवल 5.1 होने के बावजूद बहुत ज़्यादा नुक़सान हुआ था.

जलस्तर में कमी

"हमने जो सबूत जमा किए हैं उनका इस्तेमाल भविष्य में बांध, जलीय चट्टान और ग्लेशियर के क़रीब होने वाली घटनाओं के अध्ययन में किया जा सकता है."
डॉक्टर पैब्लो गॉनज़ालेज़
वैज्ञानिकों ने जब और गहराई से इसका कारण पता लगाने की कोशिश की तो पाया कि भूकंप प्रभावित इलाक़े के निकट ऑल्टो ग्वाडेलेन्टिन बेसिन के भूमि-जल स्तर में पिछले 50 सालों में 250 मिटर की कमी आई है क्योंकि इलाक़े में सिंचाई के लिए वर्षों से पानी निकाला जा रहा था.
डॉक्टर गॉनज़ालेज़ ने समाचार एजेंसी रॉयटर्स से बातचीत के दौरान इस बात पर ज़ोर दिया कि उनका अध्ययन केवल स्पेन के भूकंप पर केंद्रित था और केवल एक जगह आए भूकंप से कोई आमधारण नहीं क़ायम की जा सकती है.
लेकिन उन्होंने अपने अध्ययन के महत्व को बताते हुए कहा, ''हमने जो सबूत जमा किए हैं उनका इस्तेमाल भविष्य में बांध, जलीय चट्टान और ग्लेशियर के क़रीब होने वाली घटनाओं के अध्ययन में किया जा सकता है.''
कैलिफ़ॉर्निया इंस्टीच्यूट आफ़ टेक्नॉलोजी के प्रोफ़ेसर जीन फिलिप का कहना है कि मूसलाधार बारिश से भी भूकंप आ सकता है.
पहले किए गए कोई शोध से पता चलता है कि हाइड्रॉलिक तरीक़े से गैस निकालने के कारण भी भूकंप आने की संभावना बनी रहती है.
प्रोफ़ेसर जीन फिलिप के अनुसार अगर विज्ञान भूकंप के सटीक कारणों को पता लगाने मे सफल हो जाता है तो फिर इस तरह की प्राकृतिक विपदाओं पर क़ाबू पाने में भी सफलता पाई जा सकती है.

सर्जन ने नहीं, रोबोट ने किया दिल का ऑपरेशन

 गुरुवार, 25 अक्तूबर, 2012 को 02:42 IST तक के समाचार

न्यू क्रॉस हॉस्पिटल के सर्जनों की टीम ने 'द विंची' रोबोट का इस्तेमाल दिल के ऑपरेशन में किया
ब्रिटेन में एक महिला के दिल का ऑपरेशन किसी सर्जन ने नहीं, बल्कि एक रोबोट ने किया. ब्रिटेन में ये इस तरह का पहला ऑपरेशन है.
लंदन के वॉल्वरहैंप्टन में न्यू क्रॉस हॉस्पिटल के सर्जनों की टीम ने इस ऑपरेशन के लिए 'द विंची' रोबोट का इस्तेमाल किया.
डॉक्टरों ने परिष्कृत कैमरे की मदद से नियंत्रण कक्ष में बैठ कर इस ऑपरेशन को संचालित किया.
22 साल की नेटली जोन्स के दिल में एक छेद था जिसे ठीक करने के लिए इस ऑपरेशन की जरूरत पड़ी.
डॉक्टरों का कहना है कि रोबोट के जरिए किया गया ऑपरेशन पारंपरिक सर्जरी की तुलना में रोगियों के लिए सुरक्षित है.

सुरक्षित और आरामदेह

सामान्य तरीके से दिल की सर्जरी के लिए रोगी के सीने में लंबा चीरा लगाना पड़ता है लेकिन, रोबोट के जरिए होने वाले इस ऑपरेशन में पसलियों के बीच छोटा चीरा लगाना पड़ता है.
इसी जगह से रोबोटिक आर्म यानी रोबोटिक भुजा शरीर के अंदर प्रवेश करती है.
इसके बाद नियंत्रण कक्ष में सर्जन उच्च गुणवत्ता वाले कैमरे के माध्यम से 3 डी में रोगी के भीतरी अंग देख कर ऑपरेशन का संचालन करते हैं.
हार्ट सर्जन स्टीफन बिलिंग कहते हैं, "इस प्रकिया में दर्द कम होता है और रोगी ऑपरेशन के बाद जल्द ही अपने रोजमर्रा के काम फिर से करने लगता है."
"मैं डरी हुई थी, लेकिन मैंनें रोबोटिक सर्जरी का फैसला इसलिए किया क्योंकि मैं एक बड़े चीरे का निशान नहीं चाहती थी, साथ ही रोबोट से ऑपरेशन कराने वाली पहली महिला बनने का विचार मुझे अच्छा लगा."
नेटली जोन्स
नेटली जोन्स के दिल में एक 3.5 सेंटीमीटर लंबा छेद था और इस ऑपरेशन को पूरा करने में डॉक्टरों को नौ घंटे लगे.
नेटली जोन्स कहती हैं कि वो चाहती थीं कि जल्द से जल्द ऑपरेशन हो जाए ताकि वो वह वापस अपने 21 महीने के बेटे की देखभाल के लिए घर जा सकें.
वो कहती हैं, "मैं डरी हुई थी, लेकिन मैंने रोबोटिक सर्जरी का फैसला इसलिए किया क्योंकि मैं एक बड़े चीरे का निशान नहीं चाहती थी, साथ ही रोबोट से ऑपरेशन कराने वाली पहली महिला बनने का विचार मुझे अच्छा लगा."

प्रशिक्षण

इससे भी अधिक जटिल प्रक्रिया वाला एक ऑपरेशन पेशे से बिल्डर 43 वर्षीय पॉल व्हाइटहाउस का किया गया. इसमें उनके वॉल्व की मरम्मत करनी थी.
डॉक्टरों का कहना है कि आमतौर पर ऑपरेशन के बाद ठीक होने और काम पर वापस लौटने में छह महीने लगते हैं लेकिन व्हाइटहाउस दो महीनों के बाद ही अपने काम पर वापस लौट सकते है.
स्वीडन और फिनलैंड के बाद ब्रिटेन तीसरा यूरोपीय देश है जहाँ खुले दिल की सर्जरी के लिए रोबोट का इस्तेमाल किया गया है.
सर्जनों की टीम ने इस तरह के ऑपरेशनों के लिए फिनलैंड में व्यापक प्रशिक्षण हासिल किया है.

गुरुवार, 18 अक्टूबर 2012

पृथ्वी व खगोलीय पिंड के टकराने से बना था चंद्रमा!
वाशिंगटन। शोधकर्ताओं ने नए अध्ययन में कहा कि चंद्रमा की उत्पत्ति एक खगोलीय पिंड के पृथ्वी से टकराने के बाद उत्पन्न विशाल आग की लपटों से हुई। अपोलो अभियानों के जरिए चंद्रमा से लाई गई मिट्टी और पत्थरों के अध्ययन से पता चला है कि इनमें भारी मात्रा में जस्ता मौजूद है जिससे अरबों साल पहले चंद्रमा की उत्पत्ति का संकेत मिलता है। चंद्रमा के बिना पृथ्वी पर जीवन संभव नहीं हो सकता था क्योंकि वर्तमान की तुलना में पहले यह पृथ्वी की परिक्र मा बहुत करीब से करता था जिससे तब यहां कुछ-कुछ घंटे के अंतराल में ज्वार भाटा पैदा होते थे। इन ज्वारों से तटरेखाओं पर लवणता में नाटकीय रूप से कमी या अधिकता होती थी जिसे अरबों साल पहले डीएनए जैसे जैविक अणु ‘बायोमॉलीक्यूल’ की उत्पत्ति का जिम्मेदार माना जाता है। शोधकर्ताओं के दल का नेतृत्व करने वाले वाशिंगटन विश्वविद्यालय के डॉक्टर फ्रेडरिक मोयनियर ने कहा कि शोधकर्ताओं ने चंद्रमा की चट्टानों के पत्थरों के 20 नमूनों और एक चंद्रक्षुद्रग्रह का अध्ययन किया। इनमें वह पत्थर शामिल हैं जो अपोलो 11, 12, 15 और 17 अभियानों में लाए गए थे। चंद्रमा से लाई गई मिट्टी और पत्थरों के अध्ययन से खुलासा : शोधकर्ता