बुधवार, 24 अक्टूबर 2012

क्या ख़ुदा का कहीं वजूद है?

 रविवार, 21 अक्तूबर, 2012 को 17:55 IST तक के समाचार

बिग बैंग
हाल में हुए 'ईश्वरीय कण' की खोज इतनी अहम घटना है कि स्विट्ज़रलैंड स्थित सर्न प्रयोगशाला के संग्रहालय में चले रहे प्रदर्शनी में अधिक स्थानों पर वो अभी भी छाया हुआ है.
प्रदर्शनी में एक लघू-फ़िल्म भी मौजूद है जिसमें विश्व की उत्पत्ति के सिद्घांतों से संबंधित चित्रों को दिखाया गया है.
फ़िल्म शुरू होने पर एक आवाज़ आती है: 'क्या हम हिग्स बोसोन या ईश्वरीय कण को ढ़ूंढ़ पाएंगे?'
अब जबकि हिग्स की खोज पूरी हो चुकी है - एक ऐसी वैज्ञानिक खोज जो हमें बिग बैंग के फ़ौरन बाद के क्षणों के सबसे क़रीब लाती है; सर्न ने अपने दरवाज़े विद्वानों के लिए खोल दिए हैं जो विश्व की उत्पत्ति पर चिंतन-मनन कर रहे हैं.
पंद्रह अक्तूबर को धर्मशास्त्रियों, दार्शनिकों और भौतिकशास्त्रियों के एक समूह ने इसी मामले पर जेनेवा में एक बैठक की.

'ख़ुदा का सवाल'

लेकिन भौतिकशास्त्रियों के लिए बिग बैंग के पहले का वक़्त एक मुश्किल भरा सिंद्धांत है.
ये एक ऐसा क्षेत्र है जिसे लेकर अनुमान ही लगाया जा सकता है. तो क्या ये एक ऐसा क्षेत्र है जिसपर विज्ञान और धर्म में समझौता हो सकता है?
अरिज़ोना विश्वविद्यालय में 'उत्पत्ति प्रोजेक्ट' के प्रमुख और भौतिकशास्त्री लॉरेंस क्रास कहते हैं, "इस तरह की बैठकों से ये आभास होता है कि वैज्ञानिक ख़ुदा के सवाल पर ग़ौर करते हैं."
हिग्स बोसोन (फ़ाइल)
ये बहस हिग्स बोसोन की खोज के बाद शुरू हुई है.
"विज्ञान की ताक़त उसकी अनिश्चितता में है. सभी कुछ अनिश्चित है. लेकिन विज्ञान उस अनिश्चितता को परिभाषित कर सकता है."
"इसलिए विज्ञान में प्रगति होती है, लेकिन धर्म में नहीं."

विरोधाभास

लेकिन ये सोच की विज्ञान और मज़हब परस्पर-विरोधी हैं, बैठक में वाद-विवाद के विषय बने रहे.
जॉन लेनोक्स ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय में गणित के प्रोफ़ेसर हैं. लेकिन वो ख़ुद को एक ईसाई भी बताते हैं. वो मानते हैं कि मानव में गणित सीखने और सुलझाने की प्रवृति ख़ुदा की मौजूदगी को प्रमाणित करती है.
वो कहते हैं, "मेरे हिसाब से नास्तिकता तार्किकता का अवमूल्यन करता है जो विज्ञान के पहलूओं को समझने के लिए ज़रूरी है."
लेकिन सर्न का कहना है कि वो चाहता है कि दोनों पक्ष एक दूसरे के तर्कों को समझें.

दिशा

ऑक्सफोर्ड के ईयान रैमसे सेंटर फॉर साइंस एंड रिलीजन के निदेशक एंड्यू पिंसेंट का कहना है कि दार्शनिक सदियों से सत्य की खोज करते आए हैं.
हालांकि एक दूसरा पक्ष है कि जो लोग धर्म में यक़ीन रखते हैं वो सवाल करने से पहले ही मानते हैं कि उन्हें इसका जवाब मालूम है जबकि विज्ञान के मामले में ये बिल्कुल उलट है.
लेकिन वहीं एक और पक्ष ये भी है कि हालांकि धर्म विज्ञान के क्षेत्र में कोई नया सत्य नहीं जोड़ सकता है, लेकिन वो विश्व को लेकर हमारे ज्ञान को दिशा प्रदान कर सकता है.

हिलती धरती के पीछे की वजह क्या है?

 मंगलवार, 23 अक्तूबर, 2012 को 11:24 IST तक के समाचार

स्पेन में भूकंप
स्पेन में आए भूकंप के अध्ययन ने एक नई बहस छेड़ दी है.
स्पने के शहर लॉर्का में 2011 में आए भूकंप का अध्ययन कर रहे वैज्ञानिकों का कहना है कि वहां भू-जल के अत्यधिक दोहन को भूकंप के लिए ज़िम्मेदार ठहराया जा सकता है.
सैटेलाइट के ज़रिए भूकंप प्रभावित इलाक़े की ली गई तस्वीरें से वो ये जानने में सफल हुए कि ज़मीन के किस हिस्से में हलचल हुई थी और कौन सा हिस्सा अपनी जगह से हट गया था.
वैज्ञानिकों के अध्ययन से पता चला है कि किस तरह बोरिंग के ज़रिए वर्षों तक ज़मीन से पानी निकालने से भूकंप आने का ख़तरा बढ़ सकता है.
यूनिवर्सिटि ऑफ़ वेस्टर्न ऑनटेरियो के प्रोफ़ेसर पैब्लो गॉनज़ालेज़ और उनके सहयोगियों ने सैटेलाइट रेडार के ज़रिए भेजे गए आंकड़ों के अध्ययन के बाद पाया कि स्पेन के शहर लॉर्का में आए भूकंप में ज़मीन के केवल तीन किलोमीटर नीचे ज़मीन का एक हिस्सा अपनी जगह से फिसला था .
वैज्ञानिकों के अनुसार इसी कारण भूकंप की तीव्रता केवल 5.1 होने के बावजूद बहुत ज़्यादा नुक़सान हुआ था.

जलस्तर में कमी

"हमने जो सबूत जमा किए हैं उनका इस्तेमाल भविष्य में बांध, जलीय चट्टान और ग्लेशियर के क़रीब होने वाली घटनाओं के अध्ययन में किया जा सकता है."
डॉक्टर पैब्लो गॉनज़ालेज़
वैज्ञानिकों ने जब और गहराई से इसका कारण पता लगाने की कोशिश की तो पाया कि भूकंप प्रभावित इलाक़े के निकट ऑल्टो ग्वाडेलेन्टिन बेसिन के भूमि-जल स्तर में पिछले 50 सालों में 250 मिटर की कमी आई है क्योंकि इलाक़े में सिंचाई के लिए वर्षों से पानी निकाला जा रहा था.
डॉक्टर गॉनज़ालेज़ ने समाचार एजेंसी रॉयटर्स से बातचीत के दौरान इस बात पर ज़ोर दिया कि उनका अध्ययन केवल स्पेन के भूकंप पर केंद्रित था और केवल एक जगह आए भूकंप से कोई आमधारण नहीं क़ायम की जा सकती है.
लेकिन उन्होंने अपने अध्ययन के महत्व को बताते हुए कहा, ''हमने जो सबूत जमा किए हैं उनका इस्तेमाल भविष्य में बांध, जलीय चट्टान और ग्लेशियर के क़रीब होने वाली घटनाओं के अध्ययन में किया जा सकता है.''
कैलिफ़ॉर्निया इंस्टीच्यूट आफ़ टेक्नॉलोजी के प्रोफ़ेसर जीन फिलिप का कहना है कि मूसलाधार बारिश से भी भूकंप आ सकता है.
पहले किए गए कोई शोध से पता चलता है कि हाइड्रॉलिक तरीक़े से गैस निकालने के कारण भी भूकंप आने की संभावना बनी रहती है.
प्रोफ़ेसर जीन फिलिप के अनुसार अगर विज्ञान भूकंप के सटीक कारणों को पता लगाने मे सफल हो जाता है तो फिर इस तरह की प्राकृतिक विपदाओं पर क़ाबू पाने में भी सफलता पाई जा सकती है.

सर्जन ने नहीं, रोबोट ने किया दिल का ऑपरेशन

 गुरुवार, 25 अक्तूबर, 2012 को 02:42 IST तक के समाचार

न्यू क्रॉस हॉस्पिटल के सर्जनों की टीम ने 'द विंची' रोबोट का इस्तेमाल दिल के ऑपरेशन में किया
ब्रिटेन में एक महिला के दिल का ऑपरेशन किसी सर्जन ने नहीं, बल्कि एक रोबोट ने किया. ब्रिटेन में ये इस तरह का पहला ऑपरेशन है.
लंदन के वॉल्वरहैंप्टन में न्यू क्रॉस हॉस्पिटल के सर्जनों की टीम ने इस ऑपरेशन के लिए 'द विंची' रोबोट का इस्तेमाल किया.
डॉक्टरों ने परिष्कृत कैमरे की मदद से नियंत्रण कक्ष में बैठ कर इस ऑपरेशन को संचालित किया.
22 साल की नेटली जोन्स के दिल में एक छेद था जिसे ठीक करने के लिए इस ऑपरेशन की जरूरत पड़ी.
डॉक्टरों का कहना है कि रोबोट के जरिए किया गया ऑपरेशन पारंपरिक सर्जरी की तुलना में रोगियों के लिए सुरक्षित है.

सुरक्षित और आरामदेह

सामान्य तरीके से दिल की सर्जरी के लिए रोगी के सीने में लंबा चीरा लगाना पड़ता है लेकिन, रोबोट के जरिए होने वाले इस ऑपरेशन में पसलियों के बीच छोटा चीरा लगाना पड़ता है.
इसी जगह से रोबोटिक आर्म यानी रोबोटिक भुजा शरीर के अंदर प्रवेश करती है.
इसके बाद नियंत्रण कक्ष में सर्जन उच्च गुणवत्ता वाले कैमरे के माध्यम से 3 डी में रोगी के भीतरी अंग देख कर ऑपरेशन का संचालन करते हैं.
हार्ट सर्जन स्टीफन बिलिंग कहते हैं, "इस प्रकिया में दर्द कम होता है और रोगी ऑपरेशन के बाद जल्द ही अपने रोजमर्रा के काम फिर से करने लगता है."
"मैं डरी हुई थी, लेकिन मैंनें रोबोटिक सर्जरी का फैसला इसलिए किया क्योंकि मैं एक बड़े चीरे का निशान नहीं चाहती थी, साथ ही रोबोट से ऑपरेशन कराने वाली पहली महिला बनने का विचार मुझे अच्छा लगा."
नेटली जोन्स
नेटली जोन्स के दिल में एक 3.5 सेंटीमीटर लंबा छेद था और इस ऑपरेशन को पूरा करने में डॉक्टरों को नौ घंटे लगे.
नेटली जोन्स कहती हैं कि वो चाहती थीं कि जल्द से जल्द ऑपरेशन हो जाए ताकि वो वह वापस अपने 21 महीने के बेटे की देखभाल के लिए घर जा सकें.
वो कहती हैं, "मैं डरी हुई थी, लेकिन मैंने रोबोटिक सर्जरी का फैसला इसलिए किया क्योंकि मैं एक बड़े चीरे का निशान नहीं चाहती थी, साथ ही रोबोट से ऑपरेशन कराने वाली पहली महिला बनने का विचार मुझे अच्छा लगा."

प्रशिक्षण

इससे भी अधिक जटिल प्रक्रिया वाला एक ऑपरेशन पेशे से बिल्डर 43 वर्षीय पॉल व्हाइटहाउस का किया गया. इसमें उनके वॉल्व की मरम्मत करनी थी.
डॉक्टरों का कहना है कि आमतौर पर ऑपरेशन के बाद ठीक होने और काम पर वापस लौटने में छह महीने लगते हैं लेकिन व्हाइटहाउस दो महीनों के बाद ही अपने काम पर वापस लौट सकते है.
स्वीडन और फिनलैंड के बाद ब्रिटेन तीसरा यूरोपीय देश है जहाँ खुले दिल की सर्जरी के लिए रोबोट का इस्तेमाल किया गया है.
सर्जनों की टीम ने इस तरह के ऑपरेशनों के लिए फिनलैंड में व्यापक प्रशिक्षण हासिल किया है.

गुरुवार, 18 अक्टूबर 2012

पृथ्वी व खगोलीय पिंड के टकराने से बना था चंद्रमा!
वाशिंगटन। शोधकर्ताओं ने नए अध्ययन में कहा कि चंद्रमा की उत्पत्ति एक खगोलीय पिंड के पृथ्वी से टकराने के बाद उत्पन्न विशाल आग की लपटों से हुई। अपोलो अभियानों के जरिए चंद्रमा से लाई गई मिट्टी और पत्थरों के अध्ययन से पता चला है कि इनमें भारी मात्रा में जस्ता मौजूद है जिससे अरबों साल पहले चंद्रमा की उत्पत्ति का संकेत मिलता है। चंद्रमा के बिना पृथ्वी पर जीवन संभव नहीं हो सकता था क्योंकि वर्तमान की तुलना में पहले यह पृथ्वी की परिक्र मा बहुत करीब से करता था जिससे तब यहां कुछ-कुछ घंटे के अंतराल में ज्वार भाटा पैदा होते थे। इन ज्वारों से तटरेखाओं पर लवणता में नाटकीय रूप से कमी या अधिकता होती थी जिसे अरबों साल पहले डीएनए जैसे जैविक अणु ‘बायोमॉलीक्यूल’ की उत्पत्ति का जिम्मेदार माना जाता है। शोधकर्ताओं के दल का नेतृत्व करने वाले वाशिंगटन विश्वविद्यालय के डॉक्टर फ्रेडरिक मोयनियर ने कहा कि शोधकर्ताओं ने चंद्रमा की चट्टानों के पत्थरों के 20 नमूनों और एक चंद्रक्षुद्रग्रह का अध्ययन किया। इनमें वह पत्थर शामिल हैं जो अपोलो 11, 12, 15 और 17 अभियानों में लाए गए थे। चंद्रमा से लाई गई मिट्टी और पत्थरों के अध्ययन से खुलासा : शोधकर्ता

क्यों मौत के बाद ज़िंदा हो जाते हैं लोग?

 शुक्रवार, 19 अक्तूबर, 2012 को 08:01 IST तक के समाचार

आपने कई बार फिल्मों में देखा होगा कि कोई व्यक्ति मर जाने के बाद फिर ज़िंदा हो गया. अफसाना सा लगने वाला ये किस्सा ब्रिटेन में इस हफ़्ते हक़ीकत में सामने आया.
तस्लीम रफ़ीक नाम की महिला घर पर बेहोश हो गई और उसे अस्पताल ले जाया गया जहाँ डॉक्टरों ने 45 मिनट तक उसकी जान बचाने की कोशिश की.
तस्लीम के परिवार को बताया गया कि उनका निधन हो गया है. लेकिन रिपोर्टों की मानें तो जब 11 घंटे बाद बेटी ने माँ ने कुछ पूछा तो तस्लीम उठ गईं.
इसी तरह अप्रैल में ख़बर आई थी कि मृत घोषित किए जाने के छह दिन बाद एक चीनी महिला अपने ही ताबूत से उठ खड़ी हुई थी.
1996 में भी ऐसा एक किस्सा हुआ थ. ब्रिटेन में एक किसान की पत्नी ने नए साल से पहले आत्महत्या की और उन्हें मृत बता दिया गया. लेकिन शवगृह में पाया गया कि उनकी साँसें चल रही हैं.
तो ऐसा कैसे हो जाता है कि डॉक्टर जिसे मरा हुआ घोषित कर दें वो फिर जि़दा हो जाते हैं ?
ज़िंदा या मृत

मौत की पुष्टि से पहले चेकलिस्ट

  • कोई हरकत नहीं
  • सांस लेने की कोशिश नहीं
  • दिल की धड़कन की आवाज़ या नब्ज़ नहीं
  • आँखों की पुतलियाँ फैली हुई हों
तस्लीमा के मामले में रेडिंग में रॉयल बर्कशायर अस्पताल का कहना है कि डॉक्टर नब्ज़ को नहीं पकड़ पाए क्योंकि वो बहुत ज़्यादा धीमे चल रही थी.
हालांकि चिकित्सिक मानते हैं कि ऐसा बेहद कम होता है कि इस तरह की स्थिति में गलत आकलन हो जाए.
वैसे ब्रिटेन में मौत की कोई क़ानूनी परिभाषा नहीं है लेकिन जब चीज़ें अस्पष्ट हों तो ऐसी स्तिथि में मौत की पुष्टि के लिए कुछ दिशा निर्देश हैं.
ब्रिटेन के डॉक्टर पीटर सिम्पसन कहते हैं, “अगर दिशा निर्देश ठीक से माने जाएँ तो ग़लत आकलन संभव ही नहीं है. मौत से वापस ज़िंदा होने के मामले मैने विदेशों से ही सुने हैं जहाँ दिशा निर्देश कड़े नहीं है. मौत हो चुकी है या नहीं ये तय करने के तीन अंश हैं. पहले पूछिए कि मौत क्यों हुई, फिर मौत का डायगनोसिस करो. मौत की पुष्टि करने से पहले पाँच मिनट तक इंतज़ार करो.”
मौत के डायगनोसिस में ये परखना ज़रूरी है- दिल की धड़कन और साँस पर नज़र रखना और ये देखना कि आँखों की पुतलियाँ बड़ी हो चुकी हैं और कुछ प्रतिक्रिया दे रही हैं या नहीं.
डॉक्टर पीटर कहते हैं, “अगर कुछ शक हो तो दोबारा जाँच करनी चाहिए. कई बार दिल काम करना बंद कर देता है और फिर चलने लगत है. इसे ऑटोरिससिटेशन कहते हैं. ये ज़्यादा से ज़्यादा 90 सैकेंड तक होता है.”
फिर चलने लगी साँस
ऑटोरिससिटेशन को लज़ारस सिंड्रोम भी कहते हैं. लज़ारस सिंड्रोम इसलिए कहा जाता है क्योंकि ईशु मसीह ने लज़ारस नाम के व्यक्ति की मौत के चार दिन बाद उसे ज़िंदा कर दिया था.
2001 में इमरजेंसी मेडिकल पत्रिका में इस तरह के 25 मामले बताए गए थे. ऑटोरिससिटेशन का मतलब है कि दोबारा होश में लाने की विफल कोशिशों के बाद प्रवाह अपने आप फिर से शुरु हो जाए.
ऑटोरिससिटेशन की वजह से ही ब्रिटेन में 2009 में माइकल विल्किल्सन नाम के व्यक्ति की अंतिम क्रिया के दौरान नब्ज़ वापस लौट आई थी और उन्हें आईसीयू में भर्ती किया गया था. वे दो दिन तक ज़िंदा रहे और अंतत उन्हें मृत घोषित किया गया.
जब शरीर का तापमान बेहद कम हो जाए
कुछ मामले ऐसे होते हैं जहाँ भ्रम की स्थिति होती है.-जैसे अगर दवाओं के कारण मरीज़ का तापमान बहुत कम हो जाता है या किसी मेडिकल डिसऑडर्र की वजह से मरीज़ के खून के रसायनों में बदलाव आ जाता है ( मधुमेह वगैहर में).
डॉक्टर पीटर कहते हैं, “ऐसी स्थितियों में अगर आप लक्ष्णों को नज़रअंदाज़ करते हैं तो मौत का डायगनोसिस गलत हो सकता है. जब तक मरीज सामान्य न हो जाए तब तक इंतज़ार करना चाहिए.”
बीबीसी की हॉरीज़न डॉक्यूमेंट्री से जुड़े डॉक्टर केविन फ़ॉन्ग एक वाक्या बताते हैं, “नार्वे की ऐना स्कीइंग के दौरान बर्फीली नदी में गिर गई थीं और 80 मिनट तक फँसी रहीं. इस कारण उनके शरीर के तापमान सामान्य से 20 डिग्री कम हो गया.
डॉक्टरों ने उन्हें बचाने के लिए नौ घंटे कोशिश की. एक मशीन उनके खून को शरीर के बाहर गर्म करती थी और फिर उसे नसों में प्रवाहित किया जाता था. जैसे जैसे शरीर का तापमान सामान्य हुआ, ऐना का दिल धड़कने लगा. वो मृत से ज़िंदा हो गई.
डॉक्टर की नैतिक ज़िम्मेदारी
मौत की पुष्टि के दिशा निर्देशों में ये नैतिक बात भी शामिल है कि ये बात बिना बेवजह की देरी से बता देनी चाहिए.
डॉक्टर डेनियल कहते हैं, “किसी की मौत की पुष्टि करना दूसरों पर गहरा असर डालता है. डॉक्टरों की ये नैतिक ज़िम्मेदारी है कि वो मौत का डायगनोसिस सही तरीके से करें. ज्ञान और अनुभव की कमी, समय की कमी, थकावट, सहकर्मचारियों का दबाव ...ये सब बातें किसी डॉक्टर के आकलन को प्रभावित कर सकती हैं.
डॉक्टर डेनियल के मुताबिक जटिल मामलों में अनुभवी डॉक्टरों को ही मौत की पुष्टि करनी चाहिए. किसी दूसरे डॉक्टर की राय लेने से गलती की गुंजाइश कम हो जाती है.

मंगलवार, 16 अक्टूबर 2012

बदहाली के आंसू रोता नेहरु का 'स्विट्ज़रलैंड'

 मंगलवार, 16 अक्तूबर, 2012 को 08:34 IST तक के समाचार

भारत की बड़ी से बड़ी बिजली कंपनियों के आसमान छूते बिजली कारखाने और इन कारखानों के सामने बौने से लगते बदहाल गांव और अंधेरी बस्तियां. क्लिक करें ये नज़ारा है उत्तर-प्रदेश-मध्यप्रदेश के बीच बंटे सोनभद्र-सिंगरौली का जो आज भारत में 'बिजली का गढ़' है लेकिन फिर भी देश के सबसे पिछडे इलाकों में से एक है.
क्लिक करें सोनभद्र-सिंगरौली का ये इलाका 1962 में भारत के नक्शे पर उस वक्त चमका जब रिंहद बांध (गोविंद बल्लभ पंत सागर बांध) का उदघाटन करने प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु यहां आए और इस इलाके को भारत का स्विट्ज़रलैंड कहा.
ब्रजमोहन का परिवार
ब्रजमोहन की 43 साल की बेटी मानसिक रोग का शिकार हैं. प्रदूषण के चलते इस इलाके में विकलांगता और मानसिक बीमारियों के मामले भी अधिक हैं.
बांध विस्थापितों के गांव कुसमाहा में रहने वाले ब्रजमोहन उस दिन को याद करते हुए कहते हैं, ''विस्थापितों को अपनी ज़मीन से उजड़ने का दुख तो था लेकिन नेहरु जी ने कहा देश को विकास की ऊंचाईयों तक ले जाना है. हमसे कहा था कि गांव में बिजली आएगी और सबको नौकरी मिलेगी.''

अधूरे रह गए सपने

72 साल के ब्रजमोहन आज भी उस बिजली का इंतज़ार कर रहे हैं. दिन ढले अंधेरे में लालटेन टटोलकर रोशनी करते हुए कहते हैं, “हमारी उपजाऊ ज़मीन लेकर सरकार ने हमें यहां पठार में बसा दिया. हम आज भी हैंडपंप से पानी खींचकर खेत में सिंचाई करते हैं. यहां केवल सब्जी उगती है और पैदावार इतनी ही है कि तीन लोगों का पेट भर पाए. कंपनी वालों ने घर के बराबर में बिजली का खंभा गाड़ा था. तार भी पड़े लेकिन बिजली आजतक नहीं आई.’’
घर से बाहर निकलते ही खंभे पर नज़र पड़ी तो दिखा कि बेकार खड़ा बिजली का खंभा झोंपड़ी पर आधे से ज़्यादा झुक गया है. किसी भी दिन तेज़ बारिश या अंधड़ में गिरा तो उनकी रही-सही पूंजी भी ले डूबेगा.
कोयले और पानी के खज़ाने से आबाद लेकिन बदहाल इस इलाके में लगभग सभी गांवों और बस्तियों की यही कहानी है. 1962 में जिस जगह रिंहद बांध बना वो उस वक्त सोनभद्र-सिंगरौली का सबसे बड़ी आबादी वाला इलाका था.
"“त्याग का पाठ हमेशा उन्हीं लोगों को क्यों पढ़ाया जाता है जो लोग अपना शरीर गलाकर अपने बच्चों को अपाहिज बनाकर पहले ही इस बिजली की कीमत चुका रहे हैं. विकास के नाम पर हज़ारों करोड़ का मुनाफ़ा कमा रही इन कंपनियों क्या यहां लोगों का इलाज नहीं करा सकतीं. अब हमारे पास त्याग के लिए सिर्फ प्राण बचे हैं वो भी सरकार ले ही रही है.’’"
अजय शेखर, लेखक एंव स्थानीय निवासी
जल्द ही सरकार को इस इलाके में फैले काले सोने की खबर लगी और देखते ही देखते 2,200 किलोमीटर में कोयला खदानें भी खुद गईं. 1951 के जनसंख्या आंकड़ों के मुताबिक उस वक्त विस्थापितों की संख्या 1,05,000 थी.

बांध और खदानों से हुए बेघर

आज इलाके के ज्यादातर गांव उन बांध और खदान विस्थापितों के हैं जो अपनी ज़मीन से बेघर हुए और कारखानों के जानलेवा प्रदूषण से बेहाल हैं.
6500 मेगावाट से शुरु हुआ बिजली उत्पाद आज 10,000 मेगावाट है और 2018 तक 35,000 का लक्ष्य रखता है, लेकिन चिल्काटांड में रहने वाले वेदान्ती प्रजापति के लिए ये देश का विकास नहीं बल्कि ज़िंदगी और मौत का सवाल है.
एनसीएल की कोयला खदान वेदांती प्रजापति के घर के पीछे तक पहुंच चुकी है. खदान के नीचे बैठे वेदांती प्रजापति और उनका परिवार.
प्रजापति के घर और एनसीएल की खदान के बीच 500 मीटर से भी कम की दूरी है. घर की छत से नज़र दौड़ांए तो चारों ओर दिखते हैं आसमान छूते मिट्टी के विशाल पहाड़ जो एनसीएल की कोयला खदान से निकली है. बिना कोई सवाल उनका पहला जवाब ही सारी कहानी कह देता है, “हमको कुछ नहीं कहना है साहब, कारखानों से भागते-भागते हम थक गए. बांध बना तो घर डूब गया. बाप-दादा हमें लेकर दूसरी बस्ती में बसे. फिर एनटीपीसी ने प्लांट लगाया और हमें यहां भेज दिया. यहां भी अब गुजारा मुश्किल है. बारिश में पहाड़ों की मिट्टी घरों में घुस आती है. खदान में ब्लास्टिंग होती है तो भूकंप के जैसे पूरा घर हिलता है.”
भगोड़ों सी ज़िंदगी और रोज़ी-रोटी की तलाश में भटकने का डर वेदान्ती के चेहरे पर साफ़ दिखाई देता है, लेकिन घर के दरवाज़े तक पहुंच चुकी खदान और धमाकों से चटकती दीवारों ने ज़िंदगी को इतना बेहाल कर दिया है कि किसी भी कीमत पर लोग बस्ती छोड़ देना चाहते हैं.

'भगोड़ों सी ज़िंदगी'

विस्थापितों की सबसे बड़ी समस्या है कि कंपनियों की संख्या और खदानों का क्षेत्र लगातार बढ़ता जा रहा है. एक कंपनी उन्हें विस्थापित कर जिस जगह बसाती है वहां दूसरी कंपनी का कारखाना उनके लिए बोरिया-बिस्तर बांधे तैयार रहता है.
प्रजापति की बातचीत में जो गुस्सा झलकता है वो चिल्काटांड के लगभग हर बाशिंदे की कहानी है. अपनी आठ साल की विकलांग बेटी को स्कूल से घर लाती एक महिला को रोकर जब हमने बात करनी चाही तो दो टूक जवाब मिला, “हर कोई तो सर्वे करने चला आता है, लेकिन बदलता कुछ नहीं. पता नहीं कागजों में क्या लिखते हैं कि लखनऊ-दिल्ली जाकर सब बात पलट जाती है. हमारा नाम मत लिखिएगा. कंपनी वाले कहते हैं कि विस्थापित गुंडागर्दी करते हैं गलत बात फैलाते हैं.''
चिल्काटांड
इलाके की ज़्यादातर बस्तियां खदान से निकली मिट्टी के पहाड़ों से घिर चुकी हैं.
नई बस्ती की मांग कर रहे चिल्काटांड निवासी मनोनीत कहते हैं, “जहां आप खड़ी हैं अगले साल यहां ब्लास्टिंग हो रही होगी. इसी तरह खदान बढ़ती है. सच ये है कि जिस ज़मीन पर विस्थापितों को बसाया जाता है उसका मालिकाना हक़ कंपनी के पास रहता है. वो जब चाहे हमें हटा सकते हैं, जबकि विस्थापित न ज़मीन बेच सकते हैं न उसपर कर्ज़ ले सकते हैं. कुलमिलाकर खेत मालिक से आज हम बेघर विस्थापित हो गए.”

उद्दोगों के गढ़ में 'बेरोज़गार'

"शुरुआत में सभी बिजली-उद्दोग केंद्र या राज्य सरकार के थे. सरकारों ने बाकायदा विस्थापितों के साथ लिखित करार किए. बाद में ये उद्दोग निजी कंपनियों को सौंप दिए गए. लैंको जैसी कंपनियां अब कहती हैं कि पुराने करार की कोई मान्यता नहीं. क्या सरकार उन वादों को भी पूरा नहीं करेगी जो उसने लिखित में किए हैं."
शुभाप्रेम, वनवासी सेवा आश्रम
विस्थापन से पैदा हुई सबसे बड़ी समस्या है बेरोज़गारी की. 2011 में आई ग्रीनपीस की एक रिपोर्ट के मुताबिक केवल उत्तप्रदेश राज्य विद्युत उत्पादन निगम की अनपरा परियोजना को ही देखें तो जिन 2205 लोगों को तुरंत प्रभाव से नौकरी देने का वादा किया गया था उनमें से केवल 234 को नौकरी दी गई. ये समस्या हर गांव, हर परियोजना की है. शक्तिनगर निवासी राजबीर कहते हैं, “जितने भी कारखाने यहां खुले उनमें स्थानीय लोगों को बहुत कम नौकरियां दी गई हैं. ऊपर से लेकर नीचे मज़दूर तक बिहार, छत्तीसगढ़ दिल्ली से लाए गए हैं. विस्थापित अपने हक की बात करते हैं इसलिए उन्हें अराजक कहा जाता है और नौकरी पर नहीं रखा जाता.”
बिजली उद्दोग जैसे-जैसे बढ़ रहा है उससे जुड़ी कंपनियों की सीमेंट, रसायन और पत्थर की फैक्ट्रियां भी इलाके पर कब्ज़ा जमा रही हैं. इस साल फरवरी में पत्थर की एक अवैध खदान में हुए भयानक हादसे के बाद दिन-रात चलने वाले क्रशर तो तालाबंद हैं लेकिन जंगलों में अवैध कटाई के बाद रिहंद जलाशय में बहाकर कैसे कीमती लकड़ी की तस्करी की जा रही है ये नज़ारा हमने खुद देखा. कुलमिलाकर सोनभद्र में संसाधनों की ऐसी लूट मची है जिसमें हर कोई अपने हाथ धो लेना चाहता है.

सरकारी चुप्पी

बेलवादाह में जल स्रोत में मिलती कारखाने की राख. कारखानों की राख इलाके की मिट्टी को बंजर करती जा रही है.
बीबीसी ने सोनभद्र के प्रभारी डीएम रामकृष्ण उत्तम से इस बाबत बात करनी चाही तो उन्होंने कुछ भी कहने से मना करते हुए सीधे फोन काट दिया. लेकिन भारत की एक अरब आबादी की बिजली की ज़रूरत और विकास के सवाल पर सोनभद्र से मांगी जा रही कीमत क्या वाकई ज्यादा है.
सोनभद्र में पूरी उम्र बिताने वाले अजय शेखर इस सवाल पर टीस से भर उठते हैं, “त्याग का पाठ हमेशा उन्हीं लोगों को क्यों पढ़ाया जाता है जो लोग अपना शरीर गलाकर अपने बच्चों को अपाहिज बनाकर पहले ही इस बिजली की कीमत चुका रहे हैं. विकास के नाम पर हज़ारों करोड़ का मुनाफ़ा कमा रही इन कंपनियों को क्या इसके लिए भी बाध्य नहीं किया जा सकता कि वो कम से इन लोगों का इलाज करांए. उन्हें अपने यहां नौकरी पर रखें. अब हमारे पास त्याग के लिए सिर्फ प्राण बचे हैं वो भी सरकार ले ही रही है.’’

आबाद या बर्बाद

इस इलाके में 1954 से काम कर रही संस्था वनवासी सेवा आश्रम से जुड़ी शुभा प्रेम कहती हैं, “शुरुआत में सभी बिजली-उद्दोग केंद्र या राज्य सरकार के थे. सरकारों ने बाकायदा विस्थापितों के साथ लिखित करार किए. बाद में ये उद्दोग निजी कंपनियों को सौंप दिए गए. लैंको जैसी कंपनियां अब कहती हैं कि पुराने करार की कोई मान्यता नहीं. क्या सरकार उन वादों को भी पूरा नहीं करेगी जो उसने लिखित में किए हैं.”
सोनभद्र जो कभी अपनी चिरौंजी और कत्थे की फसल, बीड़ी बनाने वाले पलाश के पत्तों और बहेड़े के हरे-भरे जंगलों के लिए जाना जाता था, आज ऊर्जा की राजधानी है और दिन-रात धुंआ उगलते कारखानों से आबाद है.
लेकिन यहां के लोगों की टीस बस यही है कि बहेड़े से बिजली तक, विकास का ये सफर सोनभद्र-सिंगरौली को बर्बाद कर गया है.

कागज बताएगा आपका ब्लड ग्रुप

 शुक्रवार, 4 मई, 2012 को 05:09 IST तक के समाचार
किसी व्यक्ति का ब्लड ग्रुप पता करने में गल्तियों के गंभीर परिणाम हो सकते हैं.
अगर आपने लेखिका जेके रॉलिंग की हैरी पॉटर श्रृंखला पढ़ी है, तो आपको उस डायरी की याद जरूर आएगी, जो 'खुद ही लिखती' है. इसी डायरी से प्रेरित होकर शोधकर्ताओं ने ऐसा कागज बनाया है, जो व्यक्ति का ब्लड ग्रुप बताता है.
ऑस्ट्रेलिया के मोनाश विश्वविद्यालय में शोधकर्ताओं की टीम ने कागज पर आधारित सेंसर विकसित किया है जो व्यक्ति का ब्लड ग्रुप शब्दों में लिखता है.
इस सेंसर से गैर-विशेषज्ञों को नतीजों का विश्लेषण करने में मदद मिल सकती है, खासकर आपात स्थिति और मानवीय आपदाओं में.
अध्ययन अंगवांडटे केमि नाम के जरनल में छपा है.
ये सेंसर रक्त के एबीओ वर्गीकरण पर आधारित है, जिसके तहत रक्त को ए, बी, एबी, और ओ वर्गों में बांटा जाता है. साथ ही रक्त को आरएच पॉजीटिव और आरएच नेगेटिव में भी वर्गीकृत किया जाता है.
एबीओ वर्गीकरण में ए या बी वर्ग से पता चलता है कि लाल रक्त कोशिकाओं में कौन से एंटीजन मौजूद हैं.
उदाहरण के लिए अगर किसी का ब्लड ग्रुप ए है तो उसमें ए एंटीजन मौजूद होंगे, एबी ब्लड ग्रुप वाले व्यक्ति की लाल रक्त कोशिकाओं में ए और बी दोनों ही एंटीजन और ओ ग्रुप वाले व्यक्ति में कोई भी एंटीजन नहीं होगा.

ज्यादा सस्ता और तेज

इस शोध का नेतृत्व कर रहे मोनाश विश्वविद्यालय के प्रोफेसर वेई शेन ने बीबीसी को बताया कि अक्सर घर पर रक्त परीक्षण करने वाले लोग या फिर विकासशील क्षेत्रों में विशेषज्ञ रक्त के वर्गीकरण में गलती कर देते हैं और इन गलतियों के गंभीर परिणाम हो सकते हैं.
इस कागज पर ब्लड ग्रुप अक्षर खदु-ब-खुद दिखाई देने लगते हैं.
प्रोफेसर शेन ने बताया, "हमने पाया कि 80 प्रतिशत से ज्यादा आबादी नतीजे ठीक से समझ नहीं पाती. लेकिन ये यंत्र, जो लोगों का लिखित में रक्त ग्रुप दिखाएगा, इससे लोग ज्यादा आसानी से अपना ब्लड ग्रुप का पता लगा पाएंगे."
इस सेंसर की दुनिया भर के अस्पतालों और पैथोलॉजिकल प्रयोगशालाओं में इस्तेमाल हो रही रक्त वर्गीकरण तकनीकों के साथ तुलना करने पर शोध टीम ने पाया कि ये सेंसर न सिर्फ उन तकनीकों जितने ही सही हैं बल्कि उनसे ज्यादा सस्ते और इस्तेमाल में ज्यादा आसान और तेज.
प्रोफेसर वेई शेन का कहना है कि इन कारणों से ये सेंसर विकासशील क्षेत्रों के लिए सबसे सही है.
शोध से जुड़े एक और वैज्ञानिक, डॉ. जॉन ब्रेनन कहते हैं, "मुझे लगता है कि इस तरह की ब्लड ग्रुप बताने वाली कागज की पट्टियां ऐसी स्थितियों में इस्तेमाल हो सकती हैं जहां तुरंत जल्द-से-जल्द खून चढ़ाने की जररूत होती है, जैसे लड़ाई के मैदान या सड़क दुर्घटनाओं में. ऐसे मौकों पर बिल्कुल सही ब्लड ग्रुप बताने वाले ऐसे कागजी सेंसर बहुत महत्वपूर्ण होंगे."

सेंसर की संरचना

इस यंत्र में कागज के छोटे टुकड़े से बना एक सेंसर लगा होता है. सेंसर पर हाइड्रोफोबिक यानी पानी को दूर करने वाली कोटिंग है लेकिन ये कोटिंग चार 'खिड़कियों' पर नहीं लगाई गई, जिससे वो पानी सोख सकती हैं.
सेंसर के हर हिस्से का आकार अलग है. उदाहरण के लिए, एक हिस्सा 'ए' की तरह है और दूसरा 'बी' के आकार में. इन हिस्सों को एंटीबॉडी से भरा जाता है जो लाल रक्त कोशिकाओं के साथ परस्पर क्रिया करते हुए, ब्लड ग्रुप के हिसाब से, गुच्छा बना लेती हैं.
जब ए ब्लड ग्रुप की एंटीबॉडी वाले कागज के हिस्से पर ए ग्रुप के रक्त की बूंद पड़ती है, तब लाल रक्त कोशिकाएं गुच्छा बना लेती हैं और कागज के रेशों में चिपक जाती हैं जिससे 'ए' अक्षर दिखाई देता है.